
स्वामी श्रद्धानंद
अमर स्वतंत्रता सेनानी, महान शिक्षाविद, अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धानंद महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनन्य शिष्यों में प्रमुख अनुयाई थे। महर्षि के उपदेश से प्रेरित होकर अपने गुरुकुलों की स्थापना की, स्त्री शिक्षा के लिए निरंतर कार्य किया, दलितों का उद्धार करने के लिए भारतीय शुद्धि सभा और बहकावे और प्रलोभन के शिकार मुस्लिम और ईसाई बने लाखों हिंदुओं की घर वापसी कराई। रालेट एक्ट के विरोध में संगीनों का सामना करते हुए सीना तानकर खड़ा होना, जामा मस्जिद से वेद मंत्र के उच्चारण से अपने भाषण का आरंभ करना आपकी निर्भीकता और अदम्य साहस का अद्भुत उदाहरण है। राष्ट्र सेवा और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने वाले स्वामी श्रद्धानंद के ऊपर धोखे से सरफिरे अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाई और वे सदा के लिए अमर हो गए।

पंडित लेखराम
महर्षि दयानंद सरस्वती के अनन्य शिष्य, आर्य समाज के महान चिंतक, प्रचारक, लेखक और समर्पित कार्यकर्ता पंडित लेखराम का जन्म 1858 में हुआ। आपने अपना सारा जीवन आर्य समाज के प्रचार-प्रसार में लगा दिया। वे अहमदिया मुस्लिम समुदाय के नेता मिर्जा गुलाम अहमद से शास्त्रार्थ एवं उसके दुष्प्रचारों के खण्डन के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। पंडित लेखराम ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए हिंदुओं को धर्म-परिवर्तन से रोका व शुद्धि अभियान के प्रणेता बने। महर्षि के जीवनचरित् लिखने के उद्देश्य से भारत के अनेकानेक स्थानों का भ्रमण किया, अतः उनके नाम के साथ ‘आर्य मुसाफिर’ विशेषण के रूप में जुड़ गया। पं॰ लेखराम हिंदुओं को मुसलमान होने से बचाते थे। एक कट्टर मुसलमान ने 3 मार्च सन् 1897 को ईद के दिन, ‘शुद्धि’ कराने के बहाने, धोखे से लाहौर में उनकी हत्या कर दी।
पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी
महर्षि दयानंद सरस्वती जी के प्रमुख शिष्यों पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी जी का अपना अनुपम स्थान है। आपने न केवल महर्षि दयानंद सरस्वती के साक्षात दर्शन करने का गौरव प्राप्त किया बल्कि उनके निर्वाण का दृश्य अपनी आंखों से देखा था। महर्षि की प्रेरणा से आपने अंग्रेजी पर प्रमुखता से अधिकार होते हुए भी संस्कृत व्याकरण में महारत हासिल की और कई प्रेरक ग्रंथों की रचना कर एक अद्भुत विद्वता पूर्व कार्य किया। 26 वर्ष की छोटी सी आयु में कॉलेज में प्रोफेसर पद पर रहना, डीएवी जैसे शिक्षण संस्थान के संस्थापकों में अग्रणी भूमिका निभाना इत्यादि आपके ऐसे महान कीर्तिमान हैं जो युग युगांतरों और काल कालांतरों तक मानव समाज के बीच पथ प्रदर्शक की भूमिका अदा करते रहेंगे और आप चिरकाल तक देश और दुनिया को प्रेरित करते रहेंगे।
महात्मा हंसराज
महर्षि दयानंद सरस्वती जी की प्रेरणा से प्रेरित, आर्य समाज के स्तंभ, परोपकारी स्वभाव के धनी, महान शिक्षाविद और समाजसेवी महात्मा हंसराज राष्ट्र सेवा और मानव निर्माण के लिए आजीवन समर्पित रहे। आपने पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी जी के साथ महर्षि दयानंद सरस्वती जी की स्मृति में 1 जून 1986 को लाहौर में “दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल” की स्थापना करने का ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया था। आप डीएवी कालेज के 25 वर्षों तक अवैतनिक प्राचार्य भी रहे और मानव निर्माण कर युवा शक्ति को सुदिशा प्रदान करते रहे। आपके जीवन में कई बार कठिन से कठिन विपत्तियों का सामना किया लेकिन कभी वैदिक धर्म, सिद्धांत, मान्यता और परंपराओं से समझौता नहीं किया। आपने अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा को समर्पित कर दिया था।
श्यामजी कृष्ण वर्मा
महर्षि दयानंद सरस्वती जी द्वारा सन 1875, बम्बई में स्थापित आर्यसमाज के सदस्यों में प्रमुख श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भारत राष्ट्र की स्वाधीनता में बहुमूल्य योगदान दिया है । वैसे तो आप महर्षि दयानंद जी प्रेरित होकर ऑक्सफोर्ड से एम॰ए॰ और बार-ऐट-ला की उपाधियाँ प्राप्त कर पुणे में संस्कृत के प्रोफेसर भी रहे। स्वातंत्र्यवीर सावरकर भी आपसे प्रेरित होकर क्रांतिकारी कार्यो में सम्मिलित हुए। लेकिन महर्षि दयानंद जी द्वारा सिखाई गई देशभक्ति के परिणाम स्वरूप आपने लन्दन में इण्डिया हाउस की स्थापना की जो इंग्लैण्ड जाकर पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के परस्पर मिलन एवं विविध विचार-विमर्श का एक प्रमुख केन्द्र था। इस तरह इंग्लैंड में रहकर भी आपने भारत की आजादी के क्रांतिकारियों का निर्माण किया और भारत माता को स्वाधीन कराने का कीर्तिमान स्थापित किया।
सरदार अर्जुन सिंह
अमर शहीद सरदार भगत सिंह के पूज्य दादाजी सरदार अर्जुन सिंह जी ने आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती के साक्षात दर्शन करने का पुण्य प्राप्त किया था। महर्षि के वैदिक विचारों से प्रभावित होकर केवल आप ही नहीं बल्कि आपका पूरा परिवार आर्य समाजी बन गया। आप प्रतिदिन यज्ञ करते थे और हवन कुंड तथा सामग्री साथ लेकर यात्रा करते थे। आपने अपने पौत्र जगत सिंह और भगत सिंह का यज्ञोपवीत संस्कार आर्य समाज के मूर्धन्य विद्वान पंडित लोकनाथ तर्कवाचस्पति जी कराया था और उन्हें देश की आजादी के लिए समर्पित करने का संकल्प और संस्कार भी प्रदान किए थे। आपने सिख गुरुओं को वेदों की परंपरा मानने वाले सिद्ध करने हेतु उर्दू भाषा में प्रमाणित पुस्तक “गुरु साहिबान वेदों के पैरोकार थे” की रचना की और उसे वर्मन एंड कंपनी लाहौर से प्रकाशित कराया था। आप आजीवन महर्षि दयानंद की शिक्षाओं और आर्य समाज तथा वेदों का प्रचार करते रहे।
लाला लाजपत राय
पंजाब केसरी लाला लाजपत राय एक महान समाज सुधारक, शिक्षाशास्त्री और क्रांतिकारी थे। गरम दल के लाल बाल पाल की त्रिमूर्ति में से लाला लाजपत राय ने महर्षि दयानंद सरस्वती से प्रेरणा पाकर अपना संपूर्ण जीवन देश की स्वतंत्रता, स्वदेशी शिक्षा और जन कल्याण में लगा दिया और अंततः ब्रिटिश सैनिकों की लाठियों के प्रहार से शहीद हो गए। सरदार भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद ने लाला जी की मौत का बदला लेकर ईंट का जवाब पत्थर से दिया। “पंजाब नेशनल बैंक ” “लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी” LIC , तिलक पीपल्स सोसायटी के संस्थापक लाला लाजपत राय ने लिखा है कि यदि मैं आर्य समाज में दाख़िल न होता तो यह सच है कि मैं आज जो कुछ भी हूं वह न होता।
भाई परमानंद
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की राष्ट्र भक्ति की शिक्षाओं से प्रेरित भाई परमानंद का जन्म 4 नवंबर 1876 को पंजाब के मोहयाल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे सिख शहीद भाई मतिदास के वंशज और कट्टर आर्यसमाजी थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित अमेरिका में लाला हरदयाल की गदर पार्टी में वे सक्रिय रहे, 1913 में भारत लौटने के बाद उन्हें लाहौर षड़यंत्र मामले में उन्हें मृत्युदंड दिया गया, इसी खबर को पढ़कर पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने क्रांतिकारी बनने का फैसला किया था, उनके मृत्युदंड को लॉर्ड हॉर्डिंग ने उम्र कैद में बदला, बाद में वे लाहौर के नेशनल कॉलेज के चांसलर बने और हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे, पहले कट्टर आर्यसमाजी, फिर क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी के रूप में भाई परमानंद हमेशा देशसेवा में लगे रहे।
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल
“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” इस अमर गीत को गाते हुए न जाने कितने युवा देश की आज़ादी के लिए हंसते हंसते फाँसी के फंदे पर झूलकर अमर हो गए। इस गीत के लेखक अमर शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का बचपन बुरी आदतों से भरा था लेकिन जैसे ही वे आर्य समाज के संपर्क में आए और उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा तो उनका जीवन कुंदन बन गया, उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने का संकल्प लिया और विभिन्न प्रांतों में देश भक्तों को हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के तले लाकर क्रांति का बिगुल बजाया। अंग्रेज़ी सरकार भारतीयों को लूटती थी,उन्होंने काकोरी स्टेशन के पास सरकारी ख़ज़ाने को लूटकर ब्रिटिश सरकार को खुलेआम चुनौती दी। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हुए अंततः फाँसी के फंदे को गले लगाया।
खुदीराम बोस
आर्य समाज के राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों से प्रेरित खुदीराम बोस एक महान वीर बलिदानी थे। उन्होंने छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता के आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और और और ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिए आपने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। भारत की आज़ादी के संकल्प की पूर्णता के लिए आपने पंफलैट बाँटकर प्रचार करने से लेकर अंग्रेज़ अत्याचारियों के ऊपर बम से भी प्रहार किए। 19 वर्ष की आयु में आप हँसते हँसते फाँसी पर चढ़ गए और उस समय आपकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि आपको अपना आदर्श मानकर देशवासियों ने आपके नाम से डिजाइन किनारी वाली धोती पहननी आरंभ कर दी थी।
करतार सिंह सराभा
लुधियाना पंजाब में जन्मे सरदार करतार सिंह सराभा आर्य समाज के महान वीर बलिदानियों में एक प्रमुख क्रांतिकारी थे। आप अमेरिका में लाला हरदयाल जी के संपर्क में आए और उनकी प्रेरणा से वहाँ आपने ग़दर पार्टी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए भारत की आज़ादी के लिए कार्य किया। आप भारत में अनेक क्रांतिकारियों के प्रेरक रहे और आपके ऊपर लाहौर में देशद्रोह का मुक़दमा चलाया गया और 19 वर्ष की छोटी आयु में आप हँसते हँसते शहीद हो गए।
सरदार अजीत सिंह
महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनन्य शिष्य और अनुयाई सरदार अर्जुन सिंह के पुत्र तथा अमर स्वतंत्रता सेनानी सरदार भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह एक महान राष्ट्र भक्त थे। आपने अंग्रेजों की गलत नीतियों का खुलकर विरोध किया और लाला लाजपत राय के साथ देश निकाला की सजा भी काटी। आपने इरान से तुर्की, जर्मनी, ब्राजील, स्विट्जरलैंड , इटली, जापान आदि देशों में यात्रा करके आजाद हिन्द फौज की स्थापना की। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को आपने हिटलर से मिलवाया, इस दौरान आपने 40 भाषाओं पर विजय प्राप्त की और जब 1947 में आप भारत आए तब आपकी पत्नी ने भी आपसे कई प्रश्न पूछे थे। 15 अगस्त 1947 को प्रातः 4 बजे आप सदा के लिए अमर हो गए।
रास बिहारी बोस
आर्य समाजी क्रांतिकारियों की प्रेरणा से ब्रिटिश राज के विरुद्ध आज़ादी के लिए गदर षडयंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले रास बिहारी बोस ने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया अपितु विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के प्रयास में आजीवन लगे रहे। दिल्ली में तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने, गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होने हिन्दू महासभा की जापानी शाखा की स्थापना भी की तथा इसके अध्यक्ष बने। कालांतर में आप जापान के टोक्यो से भारत की स्वाधीनता के प्रति सेवा करते करते अमर हो गए।
सुखदेव थापर
भारत राष्ट्र की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों में सुखदेव थापर का अग्रिम स्थान है। आपका जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना में श्री रामलाल जी के यहाँ आर्य समाजी परिवार में हुआ। आप हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य रहे और आपने राजगुरु और भगत सिंह के साथ मिलकर महर्षि दयानंद सरस्वती जी के प्रमुख शिष्य लाला लाजपत राय की शहादत का बदला लेने के लिए जे पी सांडर्स की हत्या की थी।देश कीआज़ादी के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में आप लगातार सक्रिय रहे और 23 मार्च 1931 को आप फाँसी के फंदे पर झूल गए।
शिवराज हरि राजगुरु
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को हंसते हँसते फाँसी के फंदे को चूमकर अपना बलिदान देने वाले शिवराज हरि राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे महाराष्ट्र में हुआ था। आपको भारत की आज़ादी के लिए समर्पित होने की प्रेरणा वाराणसी में विद्याध्ययन के समय आर्य समाजी संस्कारों से ओतप्रोत अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद से मिली थी।
चंद्रशेखर आज़ाद
मात्र 15 वर्ष की उम्र में ही स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हुए चंद्रशेखर आज़ाद ने 25 वर्ष की उम्र में स्वाभिमान से अमरता प्राप्त की थी। उनकी निडरता पर इन्हें आज़ाद के नाम से जाना जाता है, पंडित राम प्रसाद बिस्मिल आर्यसमाजी थे, इसलिए इनके साथ रहने से चंद्रशेखर आज़ाद पर भी आर्य समाज की विचारधारा का प्रभाव पड़ा और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले चंद्रशेखर आज़ाद क्रांति के पथ पर चलते हुए देश को स्वतंत्र कराना चाहते थे। वे कहते थे लातों के भूत बातों से नहीं मानते, चंद्रशेखर आज़ाद थे, आज़ाद रहे और स्वराज के लिए संघर्ष करते हुए उन्होंने अपनी ही गोली से शहीद होकर यह सिद्ध किया कि आजाद कभी पराधीन होकर शहीद नहीं होते।
भाई बालमुकुंद
भाई बालमुकुंद (1889 – 8 मई 1915) महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनन्य अनुयाई और महान क्रांतिकारी भाई परमानंद जी के चचेरे भाई बालमुकुंद गदर पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। आपने भारतीय स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछार कर दिया था। दिल्ली षडयंत्र मामले में उनकी अहम भूमिका के लिए ब्रिटिश हुकूमत द्वारा उन्हें मौत की सजा सुनाई गई और फाँसी पर लटका दिया गया ।
महात्मा नारायण स्वामी
सन् 1865 ई. में अलीगढ़ में जन्मे महात्मा नारायण स्वामी जी का जीवन आर्यसमाज के इतिहास में कर्मशीलता का उज्ज्वल अध्याय है | उन्होंने महर्षि दयानन्द के मंतव्यों को समझने और परखने के बाद मानव सेवा और परोपकार के पथ पर पूरी निष्ठा के साथ समर्पित हो गए और आजीवन आर्य समाज के कार्यों को आगे बढ़ाते रहे|
स्वामी ओमानन्द सरस्वती
आर्य समाज के प्रसिद्ध गुरुकुल झज्जर के आचार्य स्वामी ओमानन्द सरस्वती का जन्म मार्च, 1910 में नरेला दिल्ली में हुआ। आपने एक महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में आदर्श स्थापित किया तथा गुरुकुल झज्जर का कुशलतापूर्वक संचालन करके मानव-निर्माण की अनुपम श्रृंखला चलाकर कीर्तिमान स्थापित किया है।
डॉ स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
आर्य समाज के सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान डॉ स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती का जन्म (24 सितम्बर 1905) को हुआ। वे भारत के रसायनविद्, आध्यात्मिक-धार्मिक चिन्तक, लेखक और वक्ता थे। उन्होने जीवन का अधिकांश भाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायन-विभाग के अध्यक्ष के रूप में बिताया। जीवन के उत्तरार्ध को उन्होने आर्य समाज की परंपरा के अनुसार सामाजिक जागरण तथा लोकोपकार हेतु ग्रन्थों के लेखन में व्यतीत किया।
स्वामी सर्वदानन्द
स्वामी सर्वदानन्द जी का जन्म सन् 1855 में होशियारपुर,पंजाब में हुआ। आपके पूर्वज आयुर्वैदिक और यूनानी पद्धति से चिकित्सा किया करते थे लेकिन आप महर्षि दयानंद की प्रेरणा से आर्यसमाज के विख्यात संन्यासी बन गये। आपने अलीगढ़ में एक ऐसे गुरुकुल का संचालन किया जिसमें पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी संस्कृत व्याकरण आदि पढ़ाते थे। इसी गुरुकुल में आर्य समाज दो प्रमुख विद्वान पं. युधिष्ठिर मीमांसक एवं आचार्य भद्रसेन जी भी पढ़े थे।
स्वामी वेदानंद तीर्थ
दिल्ली के प्रसिद्ध श्रीमददयानंद गुरुकुल महाविद्यालय खेड़ा खुर्द के संस्थापक, चुने हुए वेद मंत्रों के संग्रह पर आधारित “स्वाध्याय संदोह” के लेखक स्वामी वेदानंद तीर्थ जी की संन्यास दीक्षा और वैदिक शिक्षा वाराणसी में हुई थी। महर्षि दयानंद सरस्वती जी और आर्य समाज के प्रति आपकी निष्ठा भावना तथा मानव समाज के उपकार के लिए आपका समर्पण केवल स्तुत्य ही नहीं अनुकरणीय भी है। आपके जीवन से जुड़े अनेक प्रेरक संस्मरण अत्यंत रोचक और प्रेरणादाई सिद्ध होते हैं।
स्वामी भवानी दयाल
अफ्रीका की विदेशी धरा पर महर्षि दयानंद सरस्वती जी की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने वाले , वहां पर रहने वाले भारतीयों की आजादी का मार्ग प्रशस्त करने वाले, अफ्रीका में हिंदी को प्रतिष्ठित करने हेतु हिंदी पत्रिका का प्रकाशन और रात्रि में हिंदी की पाठशाला चलाने वाले आर्य संन्यासी स्वामी भवानी दयाल जी आर्य समाज की महान विभूति थे। आपके अभूतपूर्व कीर्तिमानों को अमर बनाए रखने हेतु आर्य प्रतिनिधि सभा फिजी द्वारा वहां पर भवानी दयाल आर्य कॉलेज की स्थापना की है, जहां पर लगातार मानव निर्माण का कार्य सफलतापूर्वक चल रहा है। आप अफ्रीका के सभी देशों में अत्यंत लोकप्रिय और प्रेरक रहे हैं ।
अमर स्वामी
आर्य संन्यासी बनने से पूर्व ठाकुर अमर सिंह के नाम से विख्यात, महर्षि दयानन्द जी के अनुपम शिष्य स्वामी अमर स्वामी सरस्वती जी ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से अनेक मतों का गहन ज्ञान प्राप्त कर वैदिक धर्म के प्रचार के साथ वेदेतर मतानुयायियों से हजारों शास्त्रार्थ कर विजय प्राप्त की। आपने जीवन भर शास्त्रार्थ परम्परा का पोषण किया और अपने वैदिक ज्ञान, पुरुषार्थ एवं कार्यों से ऋषि दयानन्द के यश को बढ़ाया है।
महात्मा आनन्द स्वामी
आर्य समाज की महान विभूति महात्मा आनन्द स्वामी जी महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनन्य भक्त एवं महान चिंतक, लेखक और आर्य समाज के सफल प्रचारक और विस्तारक थे। आपके सरल, सहज प्रवचनों पर आधारित अनेक पुस्तकें आज भी अनेक विद्वानों के प्रवचन और कथाओं में प्रासंगिक सिद्ध होती हैं।आर्य समाज के प्रेरक नेता एवं ‘आर्य गजट’ तथा ‘मिलाप’ आदि पत्रों के आप सफल सम्पादक थे। अविभाजित पंजाब की पत्रकारिता के पितामह तथा संघर्षशील आर्य संन्यासी महात्मा आनंद स्वामी का मूल नाम ‘खुशहालचन्द खुरसंद’ था।
नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ
महर्षि दयानंद सरस्वती जी की प्रेरणाओं से प्रेरित स्वतंत्रता सेनानी नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ जी आर्यसमाज के प्रमुख कार्यकर्ता, वैदिक और हिन्दी साहित्य के सृजक , पत्रकार एवं राजनेता थे। आप उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। आपने राष्ट्र सेवा और मानव कल्याण के कार्योको सदैव अपना बहुमूल्य योगदान दिया है।
पंडित रामचन्द्र देहलवी
आर्य समाज के महान शास्त्रार्थ महारथियों में पंडित रामचन्द्र देहलवी का अपना स्थान है। वैदिक धर्म एवं सिद्धान्तों मर्मज्ञ होने के साथ ही वे इस्लाम और ईसाई मत के ग्रन्थों पर भी अधिकार रखते थे। आपकी प्रबल वैदिक योग्यता और ईसाई तथा मुस्लिम ग्रंथों की समीक्षा की विशिष्ट शैली के सामने विरोधी भी शीष झुकाकर हार मान लेते थे। आर्य समाज के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सदैव स्तुत्य रहेगा।
आचार्य उदयवीर शास्त्री
आर्य समाज के सुयोग्य विद्वानों में आचार्य उदयवीर शास्त्री जी सांख्य और न्याय दर्शन के प्रमुख विद्वान थे। उपरोक्त दर्शनों पर आपके शोधपरक प्रेरक भाष्य हेतु सन् 1950 के दशक में आपको भारत के कई राज्य सरकारों द्वारा पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1950 में आपको प्रतिष्ठित मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया।
पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय
महर्षि दयानंद सरस्वती जी की शिक्षाओं और आर्य समाज की मान्यताओं को जन जन तक पहुंचाने वाले पंडित गंगा प्रसाद जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य भी रहे। आपका हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और संस्कृत भाषाओं पर विशेष अधिकार था। आपका प्रिय विषय दर्शन था। उन्हें 1931 में ‘आस्तिकवाद’ ग्रन्थ की रचना हेतु मंगला प्रसाद सम्मान प्रदान किया गया।
पंडित चमूपति एम ए
महर्षि दयानंद सरस्वती जी की शिक्षाओं और वैदिक धर्म, संस्कृति और संस्कारों के प्रचार प्रसार और विस्तार के लिए समर्पित पंडित चमूपति जी आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान और प्रचारक थे। आप हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, अरबी व फारसी आदि अनेक भाषाओं के विद्वान थे। आप अच्छे कवि एवं लेखक भी थे। आपने कई भाषाओं में अनेक प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की है।
पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु
वेदों के मर्मज्ञ विद्वान, पाणिनीय पद्धति से संस्कृत व्याकरण की शिक्षा देने के प्रबल समर्थक, राष्ट्रीय पण्डित की पदवी से सम्मानित, पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु का जन्म जालंधर जिले के मल्लूपोता ग्राम में 14 अक्टूबर 1882 को हुआ। जिज्ञासु जी ने संस्कृत का अध्ययन अष्टाध्यायी के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी पूर्णानन्द जी के सान्निध्य में किया। व्याकरण में व्युत्पन्न होने के पश्चात् स्वामी सर्वदानन्द द्वारा स्थापित साधु आश्रम हरदुआगंज में आपने आर्ष ग्रंथों का अध्ययन 1920 से प्रारम्भ किया। 1921 में यह आश्रम गंडासिंह नाला अमृतसर में विरजानन्दाश्रम के नाम से स्थानान्तरित हो गया।
पं. लोकनाथ तर्कवाचस्पति
यज्ञ प्रार्थना ” यज्ञरूप प्रभु हमारे भाव उज्जवल कीजिए” के रचयिता, वेदादि शास्त्रों के सतत स्वाध्याय शील, गूढ़ रहस्यों सरल, सहज, प्रभाव पूर्ण शास्त्रार्थी, उपदेशक पं. लोकनाथ तर्कवाचस्पति जी मूलतः सिंध प्रान्त के निवासी थे, परन्तु आपका प्रचार क्षेत्र पंजाब रहा। आप आर्य प्रादेशिक सभा पंजाब के उपदेशक भी रहे। आप वैदिक सिद्धांतों के अद्वितीय व्याख्याता, तर्कनिष्णात तथा कर्मकाण्ड प्रेमी भावुक विद्वान् थे। आपके सामने पौराणिक विद्वान थर थर कांपते थे।
डॉ ० रामनाथ वेदालंकार
आर्य समाज के गौरव आचार्य डॉ ० रामनाथ वेदालंकार वैदिक साहित्य के ख्याति प्राप्त मर्मज्ञ विद्वान् थे । स्वामी श्रद्धानंद जी द्वारा स्थापित गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार में आपकी शिक्षा दीक्षा पूर्ण हुई । इसी संस्था में 38 वर्ष वेद – वेदांग , दर्शनशास्त्र , काव्यशास्त्र , संस्कृत साहित्य आदि विषयों के शिक्षक एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष रहते हुए समय – समय पर आप कुलसचिव तथा आचार्य एवं उपकुलपति का कार्य भी करते रहे । वैदिक एवं संस्कृत साहित्य की सेवा के उपलक्ष्य में आप कई पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित हो चुके हैं। चारों वेदों का भाष्य करके आपने जो कीर्तिमान स्थापित किया है वह चिरकाल तक अविस्मरणीय रहेगा।
पण्डित भगवद्दत्त
वेदादि शास्त्रों के अध्येता, अनुसन्धानकर्ता एवं कुशल लेखक पण्डित भगवद्दत्त जी आर्य समाज के सक्रिय और समर्पित अधिकारी थे। आर्य समाज की उच्च संस्था ‘परोपकारिणी सभा’ के आप निर्वाचित सदस्य और ‘विद्वत् समिति’ के भी सदस्य थे। आपकी ख्याति एक श्रेष्ठ विद्वान व वक्ता की थी। आर्य समाज के कार्यक्रमों में देश भर में प्रवास भी करते थे। इसी कारण आप ‘पंडित भगवद्दत्त’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
आचार्य रामदेव
सन् 1923 में देहरादून में कन्या गुरुकुल महाविद्यालय ( गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्याल का भाग) की स्थापना करने वाले, त्यागी, तपस्वी आचार्य रामदेव जी का जन्म: 31 जुलाई 1881 को हुआ था। आप आर्यसमाज के नेता, शिक्षाशास्त्री, इतिहासकार, स्वतन्त्रता-संग्राम सेनानी एवं महान वक्ता थे। आपने भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में मौलिक अनुसन्धान कर हिन्दी में अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ भारतवर्ष का इतिहास प्रकाशित किया था।
आचार्य भद्रसेन
आर्य समाज के मूर्धन्य विद्वान आचार्य पंडित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी के शिष्य, आचार्य भद्रसेन जी महर्षि दयानंद सरस्वती के प्रति अटूट निष्ठा रखते थे। संस्कृत व्याकरण, योगाभ्यास, ध्यान, आसन और प्राणायाम में प्रसिद्धि पाकर आप लोनावाला योग संस्थान वा केन्द में रहे। उस संस्थान के महन्त आपको योग संस्थान का मालिक बनाना चाहते थे परन्तु आपने महर्षि दयानन्द जी का अनुकरण करते हुए यह बड़ा प्रस्ताव ठुकरा दिया और आर्यसमाज के उपदेशक व पुरोहित बने और संस्कृत अध्यापन एवं योग प्रशिक्षण के द्वारा समाज की सेवा की।
मुंशी प्रेमचंद
महर्षि दयानंद सरस्वती जी को अपना आदर्श मानने वाले, हिंदी साहित्य एवं उपन्यास लेखन में अत्यंत लोकप्रिय मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31जुलाई 1880 में वाराणसी में हुआ। महर्षि दयानंद सरस्वती जी के ग्रंथों के प्रकाशन में आपने समर्पित भाव से कार्य किया, आर्य समाज की मान्यताओं के अनुरूप विधवा विवाह के ऊपर भी कुशलतापूर्वक लेखन किया, महर्षि के विचारों और प्रेरक शिक्षाओं की झलकियां आपके साहित्य में अनेक स्थानों पर दृष्टिगत होती है। यह अलग विषय है कि मुंशी प्रेमचंद पर लिखने वाले लेखकों ने महर्षि दयानंद और आर्य समाज से उनके जुड़ाव को प्रकाश में नहीं आने दिया किंतु” आपका चित्र” और “आपकी तस्वीर” उनकी श्रेष्ठ कहानियां ही नहीं अपितु उनके जीवन की सच्ची प्रेरणाएं भी हैं। मुंशी प्रेमचन्द महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनन्य भक्त और आर्य समाज के गौरवशाली इतिहास के स्वर्णिम अध्याय थे, हैं और चिरकाल तक हमें प्रेरणा देते रहेंगे।
महाशय राजपाल
महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनन्य भक्त, आर्य समाज की मान्यताओं, सिद्धांतों और परम्पराओं के प्रखर प्रचारक, वैदिक धर्म, संस्कृति और संस्कारों के विस्तारक महाशय राजपाल जी का जन्म- 1885 को अमृतसर में हुआ। आप लाहौर के एक आर्यसमाजी नेता, प्रकाशक एवम हिन्दीसेवी और महान तार्किक विद्वान थे।मतांध लोगों द्वारा जब महर्षि दयानंद सरस्वती और योगीराज श्री कृष्ण के ऊपर गलत भाषा और भावना से दो पुस्तकें प्रकाशित हुई तब इसके विरोध में रंगीला रसूल को आपने प्रकाशित किया, जिसमे आपको सजा भी हुई और बरी भी हुए, लेकिन 6 अप्रैल 1929 को आपके ऊपर चाकुओं से हमला हुआ और सदा सर्वदा के लिए अमर हो गए।
पंडित आत्माराम अमृतसरी
आर्यसमाज के महान विद्वान पंडित आत्माराम अमृतसरी एक समाजसुधारक थे। सन् 1897 में पं0 लेखराम का बलिदान हो जाने के पश्चात् पं0 आत्मारामजी ने उनके द्वारा पूरे भारवर्ष में घूमकर संकलित की गई स्वामी दयानन्द विषयक जीवन सामग्री को सूत्रबद्ध कर एक बृहद् ग्रन्थ का रूप प्रदान किया। तथाकथित शूद्रों को वैदिकधर्मी बनाकर भरी सभा में उनके कर-कमलों से आपने अन्न और जल भी ग्रहण किया था। महर्षि दयानंद सरस्वती जी और आर्य समाज की मान्यताओं, परंपराओं और सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार तथा विस्तार के प्रति आपका अनुराग स्तुत्य और अविस्मरणीय है।
सरला ठकराल
आसमान की ऊंचाइयों पर उड़ान भरने वाली पहली भारतीय महिला पायलट सरला ठकराल का जन्म 8 अगस्त 1914 को दिल्ली में एक आर्यसमाजी परिवार में हुआ था। उच्च शिक्षा के लिए आप दिल्ली से लाहौर गई और 16 वर्ष की उम्र में आपका विवाह एयर मेल पायलट श्री PD शर्मा से हुआ, उनकी प्रेरणा से आप पहली महिला पायलट बनी और आपने मात्र 21 वर्ष की उम्र में 1936 में एविएशन पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया और साड़ी पहनकर फलाइंग क्लब में सम्मिलित हुईं तथा हवाई जाहज उड़ाने का कीर्तिमान बनाया, 15 मार्च 2008 को आपका निधन हुआ |
राकेश शर्मा
महर्षि दयानंद सरस्वती जी के अनन्य शिष्य पंडित लोकनाथ तर्कवाचस्पति जी के सुपौत्र, अशोक चक्र से सम्मानित, भारत के प्रथम और विश्व के 138 वें अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब राज्य के पटियाला जिले में हुआ था। 1966 में एनडीए में भर्ती होकर 1970 में वायु सेना ज्वाइन करने वाले राकेश शर्मा ने 1971 के युद्ध में “मिग लड़ाकू विमान” से महत्वपूर्ण सफलता हासिल की थी। 1984 में इसरो और सोवियत संघ के संयुक्त अभियान में 8 दिन तक आप अंतरिक्ष में रहे, 3 अप्रैल 1984 को दो अन्य सोवियत अंतरिक्ष यात्रियों के साथ सोयुज टी-11 में राकेश शर्मा को लांच किया गया, इस उड़ान में और सालयुत 7 अंतरिक्ष केंद्र में उन्होंने भारत की फोटोग्राफी की और अंतरिक्ष से भारत को देखने पर भारत को “सारे जहां से अच्छा” बताया। भारत सरकार ने उनको अशोक चक्र से सम्मानित किया।
आचार्य बलदेव
आर्य समाज की महान विभूति आचार्य बलदेव जी व्याकरणाचार्य, निरुक्ताचार्य, उपनिषद, दर्शनाचार्य, आयुर्वेदाचार्य एवं वेद – वेदांग के मर्मज्ञ विद्वान थे। आपके सान्निध्य में योग गुरु स्वामी रामदेव जी, आचार्य बालकृष्ण जी , आचार्य ज्ञानेश्वर जी, स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी, डॉ. सतीश प्रकाश जी, डॉ. शोभानंद जी,डॉ. योगानंद शास्त्री जी, आचार्य आर्यनरेश जी, आचार्य अखिलेश्वर जी, ब्र० आचार्य राजसिंह आर्य जी आदि विद्वानों ने आर्ष शिक्षा पद्धति से शिक्षा प्राप्त कर आर्य समाज का गौरव विश्व स्तर पर बढ़ाया है और लगातार सेवा कार्यों को आगे से आगे बढ़ा रहे हैं।
स्वामी सत्यपति परिव्राजक
आर्य समाज के सुप्रसिद्ध संन्यासी स्वामी सत्यपति परिव्राजक 1927 में हुआ था।वे योगदर्शन के प्रकाण्ड विद्वान तथा लेखक, उपदेशक थे। उनका पूर्व नाम ‘मुंशीखान’ था। उन्हें योग में व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए पूरे भारत की यात्रा करने के लिए भी जाना जाता है। आपने गुजरात के अहमदाबाद से लगभग 90 किलो मीटर की दूरी पर रोजड़ नामक स्थान पर एक विस्तृत भूभाग पर दर्शन योग महाविद्यालय की स्थापना की।
महाराणा सज्जन सिंह
महाराणा प्रताप के वंशज मेवाड़ नरेश महाराणा सज्जन सिंह महर्षि दयानन्द के परम भक्त व अनुयायी थे। कविराजा श्यामलदास एवं पं मोहनदास विष्णुलाल पंड्या के प्रयासों से महाराणा सज्जन सिंह महर्षि दयानन्द के दर्शनों के लिए उत्सुक थे। एक दिन महर्षि दयानन्द मेवाड़ में व्याख्यान दे रहे थे तो महाराणा सज्जन सिंह श्रोताओं के बीच सामान्य मनुष्य की भान्ति बैठ गये। जब महर्षि दयानन्द ने इस असाधारण तेजस्वी पुरुष के बारे में पूछा तो शाहपुरा नरेश नाहरसिंह ने उनका परिचय कराया। कालान्तर में महर्षि दयानन्द का मेवाड़ में 6 मास से अधिक का प्रवास हुआ तो महाराणा सज्जन सिंह नित्य प्रति उनके उपदेशों से लाभान्वित होने के लिए उपस्थित होते थे। उन्होंने महर्षि दयानन्द से संस्कृत भाषा का सामान्य ज्ञान प्राप्त किया और मनुस्मृति, न्यायदर्शन, वैशेषिकदर्शन एवं योगदर्शन के अनेक प्रकरण पढ़े। महर्षि दयानन्द की प्रेरणा से महाराणा सज्जन सिंह ने अपने राज्य में अनेक सुधार कार्य किये एवं हिन्दी को उदयपुर की राजभाषा बना दिया। महर्षि दयानन्द ने महाराणा सज्जन सिंह को अपनी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का अध्यक्ष मनोनीत किया।
राव युधिष्ठिर सिंह
1857 के विप्लव में पराक्रम दिखाने वाले राव तुलाराम के पुत्र रेवाड़ी नरेश राव युधिष्ठिर सिंह ने महर्षि दयानन्द के प्रथम दर्शन दिल्ली दरबार के समय दिल्ली में किये थे। तब उन्होंने महर्षि दयानन्द को अपने नगर आमंत्रित किया। कालान्तर में महर्षि दयानन्द के रेवाड़ी आगमन पर राव युधिष्ठिर सिंह ने उनकी आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। महर्षि दयानन्द के व्याख्यानों को सुनकर राव युधिष्ठिर सिंह अत्यधिक प्रभावित हुये एवं उन्होंने अपनी रियासत के लोगों को दूर दूर से आमंत्रित किया ताकि वे भी उनका लाभ उठा सकें। महर्षि दयानन्द के गौरक्षा सम्बन्धी विचारों से प्रभावित होकर राव युधिष्ठिर सिंह ने रेवाड़ी में भारत की प्रथम गौशाला की स्थापना महर्षि दयानन्द के कर कमलों से करवायी।
राजा जयकृष्णदास
महर्षि दयानन्द के प्रधान ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना के पीछे राजा जयकृष्णदास की ही प्रेरणा थी। महर्षि दयानन्द के विचारों से प्रेरित होकर राजा जयकृष्णदास ने उनसे प्रार्थना की कि यदि वे अपने मंतव्यों एवं उपदेशों को ग्रन्थरूप में निबद्ध कर दें तो अनेकानेक लोगों को इसका लाभ पहुँचेगा। राजा जयकृष्णदास ने इस भावी ग्रन्थ के मुद्रण एवं प्रकाशन का समस्त भार वहन करने का आश्वासन भी दिया। राजा जयकृष्णदास ने एक महाराष्ट्रियन ब्राहमण को ग्रन्थ लिपिबद्ध करने के लिए नियुक्त किया और महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश की रचना प्रारम्भ की। राजा जयकृष्णदास की देखरेख में सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण की 1000 प्रतियाँ छपीं। महर्षि दयानन्द जब भी मुरादाबाद जाते थे तो राजा जयकृष्णदास की कोठी पर ही ठहरते थे। महर्षि दयानन्द ने अपनी उत्तराधिकारिणी संस्था परोपकारिणी सभा में राजा जयकृष्णदास को सभासद किया।

राजा नाहर सिंह
राजन्य वर्ग में महर्षि दयानन्द के शिष्यों में शाहपुराधीश सर नाहर सिंह का नाम सर्वोपरि उल्लेखनीय है। आप ईसाई अध्यापक के प्रभाव में आकर हिन्दू धर्म के प्रति आस्था खो बैठे थे किन्तु चित्तौड़ में महर्षि दयानन्द से शंकाओं का निवारण होने पर पुनः अपने धर्म के प्रति दृढ़ हो गये। आपने ही महर्षि दयानन्द से उदयपुर के महाराणा सज्जनसिंह का परिचय कराया। आपने महर्षि दयानन्द से मनुस्मृति, योगदर्शन तथा वैशेषिक दर्शन का कुछ अंश पढ़ा और उनकी प्रेरणा से शाहपुरा राज्य में अनेक सुधार कार्य किये। महर्षि दयानन्द की प्रेरणा से आपने शाहपुरा के राजमहल में यज्ञशाला की स्थापना की। आपने अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के ओर से मलकाने राजपूतों की शुद्धि होने पर समाज में सम्मानपूर्वक सम्मिलित करने का आश्वासन दिया। आपने वर्षों तक परोपकारिणी सभा के प्रधान आदि कार्यभारों का निर्वहन किया।

जोशी अमरलाल
दण्डी स्वामी विरजानन्द जी की पाठशाला में अध्ययन हेतु जब महर्षि दयानन्द मथुरा आये तो उनके समक्ष भोजन और आवास की समस्या उपस्थित हुई। मथुरा में वे नये ही थे। ऐसे समय में मथुरा के 20 वर्षीय पं अमरलाल जोशी नामक एक धर्मशील, गुणज्ञ एवं वदान्य ब्राह्मण इस नवागत युवा सन्यासी के असाधारण व्यक्तित्व से आकर्षित हुए। वे प्रतिदिन दोनों समय महर्षि दयानन्द को अपने घर आमंत्रित कर भोजन कराने लगे। स्वामीजी के प्रति जोशीजी का आदर-भाव इतना अधिक था कि जब तक स्वामीजी भोजन नहीं कर लेते, तब तक जोशीजी भी अन्न ग्रहण नहीं करते थे। अमरलाल को क्या पता था कि वह अपरिचित सन्यासी एक दिन सनातन वैदिक धर्म का पुनरुद्धारक और उन्नायक होगा।

जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे
महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध समाज सुधारक एवं देशभक्त महादेव गोविन्द रानाडे महर्षि दयानन्द के विचारों से प्रभावित थे। वे महर्षि दयानन्द को 1875 में पूना में आमंत्रित करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में से थे। उन्होंने ही महर्षि दयानन्द के एकमात्र लिपिबद्ध प्रवचनों (पूना प्रवचन) का सम्पादन किया। रानाडे ने स्त्री शिक्षा व विधवा विवाह का समर्थन किया एवं अस्पृश्यता व बाल विवाह का घोर विरोध किया। जब पूना में महर्षि दयानन्द की उपस्थिति में आर्य समाज की स्थापना हुई तो रानाडे उसके प्रथम प्रधान निर्वाचित हुए। महर्षि दयानन्द को उनपर अगाध विश्वास था इसीलिए उन्होंने अपनी उत्तराधिकारिणी संस्था परोपकारिणी सभा में रानाडे को सभासद मनोनीत किया। राजनीतिक दृष्टि से रानाडे नरम दल के नेता माने जाते थे।

पं सुन्दरलाल
आगरा निवासी पं सुन्दरलाल पोस्टमास्टर जनरल के कार्यालय में उच्च पदाधिकारी थे। जब मथुरा में अध्ययन पूर्ण करके महर्षि दयानन्द प्रथम बार आगरा पधारे तो यमुना तट पर सेठ गल्लामल के बाग़ में ठहरे। यहाँ पं सुन्दरलाल ने उनसे अष्टाध्यायी पढ़ना आरम्भ किया। धीरे-धीरे महर्षि दयानन्द के प्रति उनकी श्रद्धा बढ़ती गई। कालान्तर में जब वैदिक यन्त्रालय को काशी से प्रयाग लाया गया तो महर्षि दयानन्द ने इसकी प्रबंधकर्त्री सभा का अध्यक्ष पं सुन्दरलाल को बनाया। महर्षि दयानन्द को उनपर अगाध विश्वास था इसीलिए उन्होंने अपनी उत्तराधिकारिणी संस्था परोपकारिणी सभा में पं सुन्दरलाल को सभासद मनोनीत किया। डाक विभाग में उन्नति करते-करते वे महाडाकपाल के पद तक पहुँचे। कुछ समय उन्होंने बर्मा (म्यांमार) के महाडाकपाल का कार्य भार भी वहन किया।
मुंशी इन्द्रमणि
उर्दू, फारसी तथा अरबी के प्रसिद्ध विद्वान एवं इस्लाम के मर्मज्ञ मुन्शी इन्द्रमणि का जन्म मुरादाबाद के एक अग्रवाल वैश्य परिवार में हुआ था। महर्षि दयानन्द से उनकी प्रथम भेंट 1873 में अलीगढ़ में हुई थी। 1879 में जब मुरादाबाद में आर्य समाज की स्थापना हुई तो मुंशी जी उसके सभासद बने। महर्षि दयानन्द उनकी इस्लाम विषयक जानकारी से प्रभावित थे। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिन्दू धर्म की निंदा में पुस्तकें निकालीं तो मुंशी इन्द्रमणि ने उनके प्रत्युत्तर में पुस्तकें लिखीं। 1880 में मुसलमानों ने पुस्तकें लिखने के लिए उनपर अभियोग चलाया तो महर्षि दयानन्द ने मुंशी जी के बचाव के लिए एक समीति स्थापित की और आगे मुकद्दमा लड़ने के लिए धन के लिए पत्रों में एक अभ्यर्थना प्रकाशित कराई। अंततः अभियोग समाप्त हुआ।

पं भीमसेन शर्मा
महर्षि दयानन्द के प्रमुख शिष्य तथा उनके ग्रंथों के लिपिकर्ता, संशोधक एवं यन्त्रालय के प्रबन्धक पं भीमसेन शर्मा महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित फर्रुखाबाद की संस्कृत पाठशाला में विद्यार्थी थे। अध्ययन समाप्त होने पर वे महर्षि दयानन्द के साथ ही रहकर ग्रन्थ लेखन में उनकी सहायता करने लगे। जब महर्षि दयानन्द ने वैदिक यन्त्रालय की स्थापना की तो पं भीमसेन ने ग्रन्थ संशोधक के रूप में प्रकाशन का कार्य भी देखा।
पं ज्वाला दत्त शर्मा
महर्षि दयानन्द के प्रमुख शिष्य तथा उनके ग्रंथों के लिपिकर्ता, संशोधक एवं परिष्कारक पं ज्वालादत्त शर्मा महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित फर्रुखाबाद की संस्कृत पाठशाला में विद्यार्थी थे। अध्ययन समाप्त होने पर वे महर्षि दयानन्द के साथ ही रहकर ग्रन्थ लेखन में उनकी सहायता करने लगे। महर्षि दयानन्द का निधन होने पर उन्होंने महर्षि-वियोग-शोक शीर्षक 30 संस्कृत पद्यों की रचना की।

पं गोपालराव हरि देशमुख
अहमदाबाद के न्यायाधीश के रूप में पं गोपालराव देशमुख का महर्षि दयानन्द से परिचय हुआ। उन्होंने महर्षि दयानन्द की वक्तृता सुनी और वे उनके भक्त बन गए। वे वर्षों तक आर्य समाज बंबई के पदाधिकारी रहे। महर्षि दयानन्द को यजुर्वेद भाष्य लिखने की प्रेरणा पं गोपालराव देशमुख ने ही दी थी। महर्षि दयानन्द ने उन्हे अपनी उत्तराधिकारिणी संस्था परोपकारिणी सभा में सभासद मनोनीत किया। उनके पुत्र डा० मोरेश्वर आर्य समाज बंबई के प्रधान रहे।

पं महादेव मोरेश्वर कुंटे
महर्षि दयानन्द को पूना आमंत्रित करने में महादेव गोविन्द रानडे के साथ पं महादेव मोरेश्वर कुंटे की भी प्रमुख भूमिका थी। आपने ही महर्षि दयानन्द के पूना प्रवचनों के मराठी भाषा में नोट्स लिए थे। इन्हीं नोट्स के महर्षि दयानन्द के एकमात्र रिकार्डेड प्रवचन होने से इनका ऐतिहासिक महत्व है। कुंटे और रानडे में परस्पर प्रगाढ़ मैत्री थी। समाज सुधार में आपकी विशेष रूचि थी।

नाना शंकर शेठ
महाराष्ट्र के समाज सुधारकों में नाना शंकर शेठ नाम अग्रगण्य है। वे सार्वजनिक कार्यों के लिए प्रचुर धन दान किया करते थे। पूना प्रवास के समय महर्षि दयानन्द इन्हीं के निवास पर ठहरे थे। उनकी महर्षि दयानन्द की असाधारण विद्वता, योग्यता तथा देशभक्ति के कारण उनमें महती श्रद्धा थी। वे महर्षि दयानन्द के बंबई प्रवास में भी प्रायः उनसे भेंट कर शंका-समाधान तथा धर्मचर्चा किया करते थे। नाना शंकर शेठ संस्कृत भाषा के महान प्रेमी थे। उनके नाम से महाराष्ट्र में आज भी जगन्नाथ शंकर शेठ छात्रवृत्ति दी जाती है।

मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी
महर्षि दयानन्द के पूर्व से ही मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी धार्मिक पाखंडों का विरोध किया करते थे। महर्षि दयानन्द के ग्रंथों से मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी अत्यंत प्रभावित हुए और उनके भक्त बन गए। अभी तक वे जो कार्य करते थे उसको शास्त्रीय प्रमाण का समर्थन भी मिल गया था। वे अपने लेखों में लोगों को सत्य जानने के लिए महर्षि दयानन्द का भक्त बनने के लिए प्रेरित करने लगे। उनकी लेखनी तीखी थी। मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी महर्षि दयानन्द से मिले और पंजाब आने का आमन्त्रण दिया। मुंशी कन्हैयालाल अलखधारी ने 1880 में पेशावर में आर्य समाज की स्थापना की।

मुंशी केवल कृष्ण
उर्दू भाषा के कवि मुंशी केवल कृष्ण मांसभक्षण, मदिरापान, वेश्यागमन आदि दुर्व्यसनों में लिप्त थे। जब महर्षि दयानन्द का पंजाब आगमन हुआ उस समय मुंशी केवल कृष्ण शाहपुर में मुंसिफ के पद पर कार्यरत थे। महर्षि दयानन्द के उपदेशों के प्रभाव से मुंशी केवल कृष्ण के सब दुर्व्यसन छूट गये और वे उनके परम भक्त बन गए। वे वर्षों तक आर्य समाज गुजरांवाला के प्रधान चुने जाते रहे। आपने डी.ए.वी. कालेज लाहौर की स्थापना के लिए पर्याप्त धनराशि दान स्वरुप अर्पित की। पहले आप श्रृंगार रस के कवि थे फिर आर्य समाज में प्रविष्ट हो जाने के बाद शान्त रस की कविताएँ करने लगे।

मुंशी समर्थदान
महर्षि दयानन्द द्वारा स्थापित वैदिक यन्त्रालय के प्रबन्धक मुंशी समर्थदान उर्दू, फारसी, हिन्दी, संस्कृत एवं स्वल्प अंग्रेजी भाषायें जानते थे। मुंशी समर्थदान के कार्य से प्रसन्न होकर महर्षि दयानन्द ने उनको एक प्रशस्ति प्रत्र भी दिया था। सत्यार्थ प्रकाश के मुद्रण के समय मुंशी समर्थदान अनेक महत्वपूर्ण संशोधनों की ओर महर्षि दयानन्द का ध्यान आकृष्ट करते रहते थे| जिन्हें वे स्वीकार कर लेते थे। सत्यार्थ प्रकाश के द्वीतीय संस्करण में जो पाद टिप्पणियाँ दी गई हैं वे मुंशी समर्थदान द्वारा ही लिखी गईं हैं। मुंशी समर्थदान के अनुभव के कारण कई देशी राज्यों के राजा उनसे परामर्श करते रहते थे।

महात्मा कालूराम योगी
महात्मा कालूराम बचपन से ही ईश्वर भक्त थे। उन्होंने महर्षि दयानन्द का साहित्य मंगा कर अध्ययन किया और उनके भक्त बन गये। महर्षि दयानन्द से महात्मा कालूराम की प्रत्यक्ष भेंट शाहपुरा में हुई। 1881 में महात्मा कालूराम ने अन्य लोगों के सहयोग से वैदिक धर्म सभा की स्थापना की। कालान्तर में इसका नाम आर्य समाज हो गया। महात्मा कालूराम ने “चमत्कारों” पर जयपुर में थियोसोफिकल सोसाइटी के कर्नल स्कॉट एवं मैडम ब्लावेटस्की से शास्त्रार्थ किया। महात्मा कालूराम ने राजस्थान के अनेक स्थानों पर प्रचार किया और आर्य समाज स्थापित कीं। उनकी स्मृति में आज भी रामगढ़ में बड़ा मेला लगता है।

महामहोपाध्याय श्यामलदास
दधिवाड़िया गोत्र के चरण परिवार में जन्मे श्यामलदास ने बाल्यावस्था में ही वृत्त रत्नाकर, कुवलयानंद, साहित्यदर्पण, रसमंजरी आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर लिया था। कालान्तर में डिंगल, हिंदी, उर्दू, फारसी आदि भाषाओँ का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। आपको महाराणा सज्जनसिंह जी के राजदरबार में सम्मानास्पद स्थान प्राप्त था। आप उदयपुर राज्य के इतिहास तथा पुरातत्व विभाग के कार्यों का सञ्चालन करते थे। आपकी सुप्रसिद्ध रचना वीर-विनोद है। आपकी प्रेरणा से ही महाराणा उदयपुर, शाहपुराधीश तथा मेवाड़ के अनेक सरदार महर्षि दयानन्द की शिक्षाओं की ओर आकृष्ट हुए थे।

पं मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या
महर्षि दयानन्द के विश्वासपात्र पं मोहनलाल ने कविराजा श्यामलदास के साथ मिलकर उन्हें उदयपुर के महाराणा से मिलवाने का विचार किया। महर्षि दयानन्द ने पं मोहनलाल को अपनी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का प्रथम उपमंत्री नियुक्त किया था। महर्षि दयानन्द के निर्वाण के बाद पं मोहनलाल ने ही अजमेर आकर परोपकारिणी सभा के अधिकारी के रूप में उनकी वस्तुओं को ग्रहण किया था। वे काफी समय तक परोपकारिणी सभा और वैदिक यन्त्रालय के कार्यों की देख रेख करते रहे।
कविवर उमरदान
डिंगल के सुप्रसिद्ध कवि उमरदान ने ही महर्षि दयानन्द को जोधपुर आमंत्रित करने की प्रेरणा वहां के राजपुरुषों को दी थी। उनके काव्य में पाखण्ड खण्डन और धार्मिक आडम्बरों के प्रति जो आक्रोश सर्वत्र मिलता है उसके पीछे महर्षि दयानन्द की विचारधारा का प्रभाव ही है। कवि उमरदान ने महर्षि दयानन्द की प्रशंसा में उत्कृष्ट कोटि का डिंगल काव्य लिखा है। दयानन्द वन्दना, दयानन्द री दया तथा दयानन्द दर्शन शीर्षक उनकी तीन कविताएँ उमरकाव्य में संग्रहीत हैं।

राव बहादुरसिंह मसूदा
अजमेर जिले की छोटी सी जागीर मसूदा के स्वामी राव बहादुरसिंह महर्षि दयानन्द के परम भक्त थे। आपने वेद भाष्य के महर्षि दयानन्द को सैंकड़ों रुपयों की बड़ी भेंट दी। जोधपुर में विष दिए जाने पर महर्षि दयानन्द को सर्वप्रथम राव बहादुरसिंह का ही ध्यान आया। महर्षि दयानन्द ने अपनी उत्तराधिकारिणी संस्था परोपकारिणी सभा में आपको सभासद मनोनीत किया। अजमेर में वैदिक यन्त्रालय, दयानन्द आश्रम तथा आर्य समाज के भवनों की भूमि क्रय करने का श्रेय आपको ही प्राप्त है।

ठाकुर कृष्णसिंह बारहट
उदयपुर के इतिहासवेत्ता कविराजा श्यामलदास के भांजे ठाकुर कृष्णसिंह बारहट को महाराणा सज्जनसिंह के राजदरबार में सम्मानित स्थान प्राप्त था। उदयपुर में ही आप महर्षि दयानन्द के शिष्य बने। आप डिंगल भाषा के मर्मज्ञ विद्वान थे। महर्षि दयानन्द के प्रभाव से पंजाब के सरदार अर्जुन सिंह की भांति आपका पूरा परिवार भी देश के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ा। आपके पुत्र केसरीसिंह प्रसिद्ध क्रान्तिकारी थे और पौत्र जोरावासिंह और प्रतापसिंह ने देश की स्वतन्त्रता के लिए अकथनीय बलिदान दिए।

ठाकुर रणजीतसिंह
जयपुर की एक जागीर अचरोल के ठाकुर रणजीतसिंह महर्षि दयानन्द के परम भक्त थे। आपको बीकानेर के ठाकुर हमीरसिंह ने महर्षि दयानन्द से मिलने का परामर्श दिया था। महर्षि दयानन्द का शिष्य बनकर आपने सभी दुर्व्यसनों का त्याग कर यज्ञोपवीत धारण किया। आपने जयपुर नरेश रामसिंह की महर्षि दयानन्द से भेंट के लिए तैयार किया परन्तु आजीविका खतरे में आने के डर से राजराजेश्वर मंदिर के पुजारियों ने महाराजा को भड़का कर भेंट न होने दी। ठाकुर रणजीतसिंह के निधन के बाद अचरोल की गद्दी पर उनके पुत्र ठाकुर रघुनाथसिंह बैठे। जब महर्षि दयानन्द अंतिम बार जयपुर की यात्रा पर आये तो जयपुर नरेश ने उन्हें राज्य से बाहर निकल जाने का आदेश दिया। परन्तु ठाकुर रघुनाथसिंह ने स्वयं के आर्य होने की घोषणा की। इस पर महाराजा को अपना आदेश वापस लेना पड़ा।

ठाकुर नंदकिशोर सिंह
ठाकुर नंदकिशोर सिंह तत्कालीन जयपुर राज्यपरिषद के सचिव थे। आप महर्षि दयानन्द के भक्त एवं परम विश्वासपात्र थे। आपने जयपुर में वैदिक धर्म सभा की स्थापना की। जो कि कालान्तर में आर्य समाज में परिवर्तित हो गई। महर्षि दयानन्द के आग्रह पर ठाकुर नंदकिशोर सिंह ने अमेरिका से प्रकाशित पुस्तक Self Contradictions of Bible का हिन्दी अनुवाद किया। जब पौराणिकों के बहकावे में आकर जयपुर नरेश सवाई माधोपुर ने आर्य समाजियों को राज्य से निष्कासित करने के आदेश दिये तो ठाकुर नंदकिशोर सिंह ने ही महाराजा को वास्तविकता से अवगत करा कर आदेश रद्द करवाया। आप वर्षों तक आर्य समाज जयपुर के प्रधान रहे।

सरदार दयालसिंह मजीठिया
प्रमुख समाचार पत्र ट्रिब्यून के संस्थापक सरदार दयालसिंह मजीठिया की गणना महर्षि दयानन्द के प्रमुख भक्तों में होती है। पहले ब्रह्म समाज के प्रभाव में आप वेदों को सर्वोच्च प्रमाण नहीं मानते थे परन्तु महर्षि दयानन्द से मिलने के बाद आपकी धारणा बदल गई। आपके पिता सरदार लहनासिंह पंजाब के महाराजा रंजीतसिंह के सेनापति थे। जब महर्षि दयानन्द पहली बार अमृतसर पधारे तो सरदार दयालसिंह मजीठिया ने ही उनके निवास की व्यवस्था की। महर्षि दयानन्द के निधन के पश्चात् ट्रिब्यून ने 3 नवंबर के अंक में उनको भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित की। आर्य समाज लाहौर द्वारा स्थापित भारत के पहले स्वदेशी बैंक पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना में सरदार दयालसिंह मजीठिया का प्रमुख योगदान रहा।

राजा तेजनारायण सिंह
भागलपुर के प्रसिद्ध जमींदार राजा तेजनारायण सिंह महर्षि दयानन्द के भक्त थे। अपनी प्रजा के पालन के लिए आपने अपने ताल्लुके में कुआँ, तालाब, नालियां, बांध आदि के निर्माण हेतु लाखों रुपयों का व्यय किया। 1887 ई० में आपने आर्यावर्त्त प्रेस की स्थापना के लिए 20000 रूपये की राशि भेंट की। महर्षि दयानन्द की जीवनी की सामग्री एकत्र करने के लिए आपने देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय को पर्याप्त धनराशि प्रदान की। जब कलकत्ता में आर्य समाज की स्थापना हुई तो आप उसके संस्थापक प्रधान निर्वाचित हुए।

राजा दुर्गा प्रसाद
फर्रुखाबाद के धनाड्यों में महर्षि दयानन्द के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वहां जब संस्कृत पाठशाला स्थापित हुई तो उसका संचालन यही लोग करते थे। इन्हीं में से एक राय बहादुर राजा दुर्गा प्रसाद रईस थे जो महर्षि दयानन्द के फर्रुखाबाद आगमन पर उनसे धर्म चर्चा करने लगे। धीरे-धीरे वे महर्षि दयानन्द के परम भक्त एवं विश्वासपात्र बनते गये। आपने महर्षि दयानन्द की वेद भाष्य मुद्रण निधि में 6000 रूपये प्रदान किये। महर्षि दयानन्द ने अपनी उत्तराधिकारिणी संस्था परोपकारिणी सभा में आपको सभासद मनोनीत किया। आप आर्य प्रतिनिधि सभा पश्चिमोत्तर प्रदेश के प्रधान निर्वाचित हुए।

महाराजा प्रतापसिंह
गुजरात के ईडर राज्य के महाराजा प्रतापसिंह पूर्व में जोधपुर के प्रधानमन्त्री रहे। जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह हरसम्भव दुर्व्यसनों में लिप्त थे। साथ ही दीवान फैजुल्ला खां और वेश्या नन्हीं के प्रभाव में राजकार्यों और पदों में मुसलमानों को अनुचित विशेषाधिकार प्राप्त थे। इन्हीं सब परिस्थितियों में सर प्रताप ने महर्षि दयानन्द को जोधपुर आमंत्रित किया। सर प्रतापसिंह की महर्षि दयानन्द में अगाध श्रद्धा थी तथा उनके कार्यों को वे देश की बहुत बड़ी सेवा के रूप में देखते थे। महर्षि दयानन्द के विचारों ने ही उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया कि तुर्कों व मुगलों द्वारा जबरन बनाये गये मुसलमानों को पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित कर लिया जाये। महर्षि दयानन्द ने महाराजा जसवंतसिंह को लिखे पत्र में प्रतापसिंह को रत्न बताते हुए उन्हें राजकार्यों कभी पृथक् न करने की प्रेरणा दी थी। महर्षि दयानन्द के निधन के पश्चात् जोधपुर में उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की जिसका पूरा खर्च जोधपुर राज्य द्वारा दिया जाता था। सर प्रतापसिंह ने ही डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर का शिलान्यास भी किया था।

रावराजा तेजसिंह वर्मा
रावराजा तेजसिंह वर्मा जोधपुर नरेश महाराजा तख़्तसिंह के अनौरस पुत्र थे। महर्षि दयानन्द को जोधपुर आमंत्रित करने में आपकी भी प्रमुख भूमिका थी। महाराजा जसवंतसिंह ने महर्षि दयानन्द को जोधपुर आमन्त्रित करने का आदेश देते हुए उनकी जोधपुर यात्रा की सम्पूर्ण व्यवस्था की जिम्मेदारी रावराजा तेजसिंह वर्मा को सौंपी। महाराजा जसवंतसिंह ने महर्षि दयानन्द के चित्र अंकित करवाकर हाथीदांत का एक पदक हाथीदांत रावराजा तेजसिंह वर्मा को दिया था जिसे वे हमेशा अपने वस्त्रों पर पहने रहते थे। 1925 में महर्षि दयानन्द जन्म शताब्दी में आपने भाग लिया और महर्षि दयानन्द के साथ अपने संस्मरण सुनाये। आप आर्य प्रतिनिधि सभा राजस्थान के वर्षों तक प्रधान रहे।

छत्रपति शाहूजी महाराज
शोलापुर नरेश छत्रपति शाहूजी महाराज छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज थे। 1902 में इंग्लैंड जाते समय उनकी भेंट जोधपुर के महाराज सर प्रतापसिंह से हुई जिन्होंने आर्य समाज से उनका प्रारंभिक परिचय कराया। इसी बीच महाराष्ट्री ब्राह्मणों ने शाहूजी को शूद्र बताते हुए उनको वेद मन्त्र बोलने का अधिकार न होने की घोषणा की। इसके विरुद्ध शाहूजी ने स्वयं को महर्षि दयानन्द का अनुयायी घोषित करते हुए सभी मनुष्यों को वेद पढ़ने का अधिकार होने की घोषणा की। आपने अपने राज्य में सुधार कार्य के लिए अनेक कानून बनाये। आपका संकल्प था कि ‘आर्य धर्म विश्व धर्म बने’। उन्होंने शिवाजी वैदिक विद्यालय की स्थापना की। शाहू दयानंद नाम से कॉलेज खुलवाया। स्वामी श्रद्धानंद नामक आर्य मंदिर बनवाया। गोहत्या प्रतिबंधक कानून लागू किया। 1918 से 1935 के बीच ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की 26000 प्रतियाँ छपवायीं। राज्य में सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का अध्ययन करना और परीक्षा देना अनिवार्य कर दिया गया। आपने दलितों के लिए उपनयन और वेद की शिक्षा का प्रबंध किया।

महाराजा सयाजीराव गायकवाड़
गुजरात में ईसाई मिशनरियों द्वारा दलितों के अंधाधुंध धर्मांतरण किया जा रहा था। दलितोद्धार के लिए महर्षि दयानन्द के विचारों से प्रभावित बड़ोदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने पंजाब से आर्य समाज के प्रचारकों को अपने राज्य में आमंत्रित किया। मास्टर आत्माराम अमृतसरी की प्रेरणा से महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने अपने राज्य में दलितोद्धार के अनेक कार्य प्रारम्भ किये। मास्टर आत्माराम अमृतसरी की संस्तुति पर ही भीमराव अम्बेडकर को बड़ोदा राज्य से सहायता मिलनी प्रारम्भ हुई। 1911 में बम्बई की आर्य धर्म परिषद् के सभापति के रूप में आपने प्रभावशाली भाषण दिया और महर्षि दयानन्द के सिद्धांतों का प्रचार किया।

महाराजा हरिसिंह
जम्मू कश्मीर के अंतिम डोगरा शासक महाराजा हरिसिंह की महर्षि दयानन्द के प्रति श्रद्धा का अंदाजा इस बात से लग जाता है कि उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति आर्य समाज को मरणोपरांत दान कर दी थी। प्रसिद्ध आर्य समाजी जस्टिस मेहरचन्द महाजन को आपने प्रधानमंत्री बनाया। महर्षि दयानन्द की शिक्षाओं का पालन करते हुये महाराजा हरिसिंह ने सोलह वर्ष के आयु से कम बच्चों को धूम्रपान निषेध किया, मंदिरों के द्वार सम्पूर्ण समाज के लिए खुलवाये यानी हरिजनों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिया एवं विधवा विवाह यानी पुनर्विवाह को वैधानिक मान्यता दी। आपने रणवीर दंड विधि में संशोधन कर दलित समाज को सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी लेने से रोकने, मंदिरों में प्रवेश न देने के लिए सजा का प्रावधान किया। रियासत शिक्षा, दलितोद्धार एवं शुद्धि के लिए कार्य कर रहे आर्य समाज के कार्यकर्ताओं को महाराजा ने अपना पूर्ण समर्थन और संरक्षण दिया।

राजा रणंजय सिंह
अमेठी राजघराने के राजा रणंजय सिंह महर्षि दयानन्द के अनुयायी थे और आर्य समाज से सक्रिय रूप से जुड़े रहे। वे आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश के प्रधान पद पर तीन बार शोभायमान रहे। उन्होंने समाज सुधार, धर्म प्रचार एवं शिक्षा प्रसार करते हुए बलिप्रथा, मद्यपान, छुआछूत, बेमेल विवाह जैसी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का सार्थक प्रयास किया। स्वतंत्रता के पूर्व वे सेंट्रल असेंबली से लेकर लोकसभा, विधान परिषद एवं विधानसभा के सदस्य रहे। अमेठी जैसे अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र में प्राइमरी स्कूल से लेकर डिग्री कॉलेज की स्थापना करके उन्होंने निर्धन, साधनहीन एवं अभावग्रस्त जनता को शिक्षा का अवसर सुलभ कराया। आपके पुत्र डॉ० संजय सिंह अमेठी से सांसद रहे।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह
महेंद्र प्रताप आर्य विचारधारा वाले मुरसान नरेश राजा घनश्याम सिंह के पुत्र थे। महेंद्र प्रताप जब 16 वर्ष की आयु के थे तो पिता की मृत्यु होने पर अन्य राजकुमारों की बुरी संगत में महेंद्र प्रताप को भी शराब की लत लग गयी। परन्तु आर्य समाज से प्रभावित होकर शराब को सदैव के लिए त्याग दिया। पुत्री और पुत्र का जन्म होने पर आपने महर्षि दयानन्द कृत ‘संस्कार विधि’ से उनका नामकरण संस्कार स्वयं ही किया। आपने सारे देश का भ्रमण कर गरीबी, रूढ़िवादिता, जात-पात, छुआ-छात, ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा तथा अंग्रेजों के शासन का कुचक्र देखा। आपने विदेशों की यात्रा कर आधुनिक तकनीक का महत्व समझा और वृन्दावन में भारत के पहले तकनीकी संस्थान प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की। आपने महर्षि दयानन्द की इच्छानुसार गुरुकुल स्थापना के लिए वृन्दावन में अपना 90 एकड़ का बाग अर्पित कर दिया। आपकी क्रांतिकारी विचारों व गतिविधिओं से भयभीत होकर ब्रिटिश सरकार आपको बंदी बनाना चाहती थी तो आप प्रेम महाविद्यालय की जिम्मेदारी स्वामी श्रद्धानन्द के पुत्र हरीशचन्द्र को सौंप कर विदेश चले गये। वहां आपने श्यामजी कृष्ण वर्मा एवं लाला हरदयाल जैसे आर्य नेताओं से मिलकर भारत की स्वतंत्रता के लिए योजना बनायी और कार्य किया। जापान से सम्बन्ध होने के आरोप में अमेरिका में आपको गिरफ्तार कर लिया गया। भारत के बंटवारे के लिए आपने गाँधी जी को कड़ी फटकार लगायी। आप आर्यन् पेशवा के नाम से विख्यात हुये।

सरदार भगत सिंह
महर्षि दयानन्द के हाथों से यज्ञोपवीत धारण करने वाले सरदार अर्जुन सिंह के पौत्र सरदार भगत सिंह का जन्म पंजाब के एक क्रांतिकारी आर्य परिवार में हुआ। भगत सिंह के यज्ञोपवीत संस्कार के समय उनके दादा ने उन्हें देश की स्वाधीनता के लिए अर्पित करने की घोषणा की थी। भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई डी.ए.वी. कॉलेज एवं नेशनल कॉलेज में आर्य समाज की क्षत्र छाया में पूरी की। इस प्रकार भगत सिंह के जीवन की दिशा निर्धारित हो चुकी थी। आपको दृढ़ विश्वास हो गया था कि अहिंसा से स्वतंत्रता मिलना सम्भव नहीं है। अतः उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। आपने अपने साथियों के साथ ए.एस.पी. सांडर्स की हत्या कर लाला लाजपत राय के बलिदान का बदला लेने का प्रण पूरा किया। आप अपने क्रांतिकारी मिशनों के लिए आर्य समाज, गुरुकुलों व घरों में छुपते थे। मदमस्त ब्रिटिश सरकार को होश में लाने के लिए आपने केंद्रीय असेम्बली में निरापद बम विस्फोट कर पर्चे फेंके और गिरफ्तारी दी। ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह को उनके साथियों राजगुरु एवं सुखदेव के साथ फांसी दे दी।

शुक्रराज शास्त्री
नेपाल के राज्य ज्योतिषी श्री पं० माधवराव जोशी काशी में महर्षि दयानन्द के साक्षात् व्याख्यान सुनकर उनके परम भक्त बन गये थे। उन्होंने अपने पुत्र शुक्रराज को गुरुकुल में पढ़ने के लिए भारत भेजा। शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात् शुक्रराज शास्त्री नेपाल जाकर जनता को कुरीतियों के विरुद्ध जागृत करने लगे। उन्होंने नेपाल में सुधार के लिए भारत आकर पं मदनमोहन मालवीय, नेताजी सुभाषचंद्र बोस एवं गांधीजी आदि नेताओं से भेंट की। नेपाल के महाराजा चंद्र शमशेर जंग बहादुर राणा के समक्ष उनके गुरु श्री हेमराज से शुक्रराज शास्त्री का शास्त्रार्थ हुआ जिसमें श्री हेमराज निरुत्तर हो गये। इससे महाराजा अत्यंत क्रुद्ध हो गये। परन्तु शुक्रराज शास्त्री ने खण्डन-मण्डन का अपना कार्य जारी रखा। भारत में स्वतंत्रता सेनानियों से मिलने जुलने के कारण ब्रिटिश सरकार भी उन पर कुपित थी। अंततः भारतीय नेताओं व क्रांतिकारियों से मिलकर नेपाल सरकार के विरुद्ध षड्यन्त्र करने के झूठे आरोप में उन्हें फांसी दे दी गई। जनता को भयाक्रांत करने के लिये शुक्रराज शास्त्री का शव 1 दिन तक वहीं लटकाये रखा गया और एक तख्ती शुक्रराज शास्त्री के गले में लटका दी गई जिस यह लिखा था कि ‘सारे देश को भड़काने वाले क्रान्तिकारियों के गुरु और आर्यसमाजी होने के लिए ऐसा ही दण्ड मिलना था।

मदन लाल धींगरा
क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा का जन्म अमृतसर के एक आर्य परिवार में हुआ था। उनके पिता दित्तामल जी सिविल सर्जन थे और आर्यसमाज से जुड़े थे। जबकि माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं भारतीय संस्कारों में रची-बसी थीं और आर्यसमाज के आयोजनों में नियमित रूप से जाती थीं। आगे की पढ़ाई के लिए आप लन्दन पहुँचे और इंडिया हाउस में आपको महर्षि दयानन्द के अनन्य भक्त श्यामजी कृष्ण वर्मा एवं वीर सावरकर के सानिध्य मिला। लन्दन में आपने क्रूर ब्रिटिश अधिकारी लार्ड कर्जन की गोली मार कर हत्या की। जिसके लिए ब्रिटिश सरकार ने आपको फांसी की सजा दी।

अशफाकुल्ला खां
भारत की स्वतंत्रता के लिए फांसी चढ़ने वाले पहले मुस्लिम अशफाकुल्ला खां के पिता सहित परिवार के अनेक लोग ब्रिटिश सेना में थे जबकि ननिहाल के कई सम्बन्धी ब्रिटिश सरकार में उच्च पदों पर थे। ऐसे ब्रिटेन-परस्त परिवार के अशफाकुल्ला खां को क्रांति के मार्ग पर लाने का श्रेय महर्षि दयानन्द के परम भक्त एवं महान क्रान्तिकारी पं रामप्रसाद बिस्मिल को जाता है। पं रामप्रसाद बिस्मिल स्वयं आर्य समाज के सक्रिय सदस्य थे और अशफाक भी उनसे प्रेरित होकर आर्य समाज में ही क्रांति की योजनायें बनाने लगे। एक बार शाहजहांपुर में मुस्लिम दंगाई आर्य समाज मन्दिर पर हमला करने आये तो अशफाक ने तुरंत पिस्तौल निकाल कर दहाड़े – ‘मैं भी मुसलमान हूँ लेकिन इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे जान से प्यारी है। अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर नजर भी उठाई तो मेरी गोली का निशाना बनेगा।’ कालान्तर में अशफाक ने बिस्मिल के नेतृत्व में काकोरी काण्ड को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया। एक पठान दोस्त की गद्दारी के कारण अशफाक पकड़े गये और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फांसी दे दी।

विनायक दामोदर सावरकर
महर्षि दयानन्द के भारत की स्वतंत्रता एवं हिन्दुओं की एकता के प्रति विचारों का विनायक दामोदर सावरकर पर गहरा प्रभाव था। महर्षि दयानन्द के परम शिष्य श्यामजी कृष्ण वर्मा ने कानून की पढाई पूरी करने हेतु विनायक को इंग्लैंड आने में सहायता की। लंदन का ‘इंडिया हाउस’ क्रांतिकारियों का तीर्थस्थल था। वहाँ जाकर इन्होंने क्रांति के लिए सभाएं की, पर्चे व पुस्तकें बांटनी शुरू कर दी। ब्रिटिश सरकार ने उनकी क्रांतिकारी गतिविधिओं के लिए उन्हें 2 जन्मों तक कालापानी की सजा सुनाकर कड़ी यातनायें दीं। यद्यपि जनता के दवाब के कारण विनायक को छोड़ना पड़ा। निजाम हैदराबाद के विरुद्ध आर्य समाज द्वारा किये गये हैदराबाद आन्दोलन में उन्होंने अपना योगदान दिया। वे कहते थे कि हिन्दू जाति की ठंडी रगों में उष्ण रक्त का संचार करने वाला ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश अमर रहे।

कैप्टन नीरा आर्या
नीरा आर्या भारत की पहली महिला गुप्तचर थीं। बचपन में नीरा के माता पिता के देहांत के बाद खेकड़ा में आर्य समाज के कार्यक्रम में भाग लेने आये कलकत्ता के सेठ छज्जूमल ने नीरा और उनके भाई को गोद लिया। उनसे ही नीरा को देशप्रेम की प्रेरणा मिली। आपका विवाह कलकत्ता के श्रीकांत जय रंजन दास से हुआ। जब नीरा को पता चला कि श्रीकांत ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर विभाग में अफसर है तो उसने पति का घर छोड़ दिया। सिंगापुर पहुँच कर नीरा आर्या आज़ाद हिन्द फ़ौज की रानी झाँसी रेजिमेंट में भर्ती हो गईं और रेजीमेंट की प्रथम कमांडर डा० लक्ष्मी सहगल व सचिव मानवती आर्या के नेतृत्व में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया।। इसके बाद नीरा को अंग्रेजों की जासूसी करने की जिम्मेदारी दी गयी जो आपने बखूबी निभायी। शीघ्र ही आपको कैप्टन बनाकर नेताजी की सुरक्षा की दायित्व दिया गया। एक बार श्रीकांत को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की सूचना मिली और उसने घात लगाकर उनकी गाड़ी पर गोली चला दी जो उनके चालक को लगी। यह देख नीरा ने श्रीकांत को रायफल की संगीन से मारकर नेताजी के प्राणों की रक्षा की। ब्रिटिश सरकार ने नीरा को पकड़ लिया और कड़ी यातनायें दीं परन्तु आपने नेताजी या आजाद हिन्द फौज के बारे में कोई जानकारी नहीं दी।

स्वामी स्वतन्त्रतानंद
लुधियाना के मोहि ग्राम में जन्मे केहर सिंह लताला के उदासी साधुओं के डेरे में पं विशन दास से वैद्यक पढ़ते थे। वैदिक धर्मी विचारों के पं विशन दास जी संस्कृतज्ञ एवं सुयोग्य चिकित्सक थे। उनके प्रभाव में आकर केहर सिंह पर भी महर्षि दयानन्द के विचारों की छाप पड़ी। उन्हीं की प्रेरणा से आपने संस्कृत पढ़ी और आर्यसमाज के माध्यम से देश सेवा और धर्म रक्षा की ठानी और आर्य समाज को अपना जीवन भेंट करने का संकल्प ले लिया। इसके बाद आपने महर्षि दयानंदकृत ग्रंथों का और अन्य वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया जिससे आपके जीवन की भावी दिशा निर्धारित हो गयी। सन्यास लेने के बाद आपका नाम स्वामी स्वतन्त्रतानंद हुआ। आपने भारत के अतिरिक्त जावा, सुमात्रा, मलाया, सिंगापुर, फिलीपीन्स, बर्मा, मॉरिशस व अफ्रीका आदि देशों में सनातन वैदिक प्रचार का प्रचार किया। स्वदेश वापसी पर आप स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और जेल यात्रा की। आपने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब द्वारा लाहौर में स्थापित दयानंद उपदेशक विद्यालय के आचार्य पद के कार्यभार का दस वर्ष तक निर्वहन किया। हैदराबाद सत्याग्रह में आपका अद्वितीय योगदान रहा। आपने दयानन्द मठ दीनानगर सहित अनेक महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की। अस्पृश्यता निवारण और दलितोद्धार के लिए अनेक कार्य किए। आप कई भाषाओं के विद्वान, लेखक, वक्ता इतिहास के मर्मज्ञ विद्वान थे। आप आर्य समाज की शिरोमणि संस्था सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के कार्यकर्ता प्रधान रहे।

स्वामी दर्शनानंद
महर्षि दयानन्द के बाद आर्य समाज के कार्य को गति देने वालों में स्वामी दर्शनानंद का नाम प्रमुख है। 18 जून 1878 को अमृतसर में सरदार भगवान सिंह जी के घर पर पौराणिक विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ के अवसर पर पं कृपाराम ने महर्षि दयानन्द के साक्षात दर्शन किये। इसके पश्चात् आपने महर्षि दयानन्द के अनेक व्याख्यान सुने और उनके भक्त बन गये। आपने अपने जीवन में सैंकड़ों शास्त्रार्थ किए, अनेकों गुरुकुल खोले व सैंकड़ों लघु पुस्तकें (ट्रैक्ट) लिखीं। आर्य समाज के अनेक भावी विद्वान एवं कार्यकर्ता आपसे ही प्रभावित होकर आर्य समाजी बने। आर्यसमाज में आने से पहले आप वेदान्ती थे। तब आपने संन्यास लेकर साधु नित्यानन्द नाम धारण किया था। आर्यसमाजी बनने पर आपने सन् 1901 में पुनः संन्यास लेकर स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती नाम धारण किया। आप हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अरबी व फारसी भाषाओं के विद्वान एवं हिन्दी व उर्दू के कवि थे। आप पर दो बार न्यायालय में अभियोग भी चले। स्वामी दर्शनानन्द ने अपने जीवन में अनेक गुरुकुलों की स्थापना की जिनमें सबसे प्रसिद्ध गुरुकुल ‘गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर’ है।

स्वामी आत्मानंद सरस्वती
मेरठ में जन्मे मुक्तिराम ने काशी में व्याकरण व साहित्य के अध्ययन के साथ ही साथ वेदान्तिक दर्शनों का भी बड़ी लगन, श्रद्धा व पुरुषार्थ से विद्याध्ययन किया। यहां शिक्षा काल में ही आप आर्य समाज के सम्पर्क में आये। आपने महर्षि दयानन्द के सिद्धान्तों का गहनता से चिन्तन, मनन व अनुशीलन कर आत्मसात किया। स्वामी दर्शनानन्द जी द्वारा स्थापित रावलपिंडी के चोहा भक्तां गुरुकुल के आप वर्षों आचार्य रहे। विभाजन के बाद आपने यमुना नगर में वैदिक साधना आश्रम की स्थापना की तथा इस आश्रम के अन्तर्गत उपदेशक विद्यालय आरम्भ किया। आपने हैदराबाद आन्दोलन में भाग लिया। कालान्तर में आप आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब प्रधान बने।

स्वामी ध्रुवानंद
निर्धन और अशिक्षित परिवार जन्मे धुरिया को बचपन में ही पशु चराने के काम पर लगा दिया गया। कुछ दिनों बाद स्वामी सर्वानन्द ने आपको अपनी संस्कृत पाठशाला के छात्रावास में भोजन बनाने का काम दिया। आपकी पढ़ने में रूचि देख स्वामी जी आपको भी पढ़ाने लगे। आगे बढ़ते हुए आपने पंजाब विश्वविद्यालय से शास्त्री, जयपुर से नव्य शास्त्र तथा काशी से दर्शन शास्त्र की उच्च शिक्षा पायी। आप बंगाल और गुरुकुल बैद्यनाथ धाम, बिहार में प्राचार्य रहे। आपकी ख्याति सुनकर शाहपुर नरेश ने अपने युवराज सुदर्शन देव को पढ़ाने के लिए आपको बुलाया और राजगुरु का सम्मान दिया। अन्य अनेक राजाओं की ओर से भी आपको भरपूर मान सम्मान प्राप्त हुआ। हैदराबाद आन्दोलन में सम्मिलित हुए और जेल की यातनाएँ सहीं। 1946 में जब सिन्ध प्रान्त में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर प्रतिबन्ध लगा, तो इसके विरुद्ध उन्होंने कराची में सत्याग्रह किया। अलीगढ़ के पास स्थित सर्वदानन्द साधु आश्रम में स्वामी आत्मानन्द से संन्यास की दीक्षा लेकर आप राजगुरु धुरेन्द्र शास्त्री से स्वामी ध्रुवानन्द सरस्वती हो गये। आपने युगाण्डा, जंजीबार, बर्मा, मारीशस, सिंगापुर, थाइलैण्ड आदि देशों में वैदिक धर्म का प्रचार किया। जब आर्यसमाज ने गोहत्या बन्दी के लिए पूरे देश में आन्दोलन चलाया, तो उसकी बागडोर आपको ही सौंपी गयी। कालान्तर में आप संयुक्त प्रान्त की आर्य प्रतिनिधि सभा एवं आर्य समाज की शिरोमणि संस्था सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान बने।

स्वामी शंकरानन्द
विदेशों में सनातन वैदिक धर्म के प्रचार, रक्षण एवं संगठनीकरण करने वालों में स्वामी शंकरानन्द का नाम प्रमुख है। जब 1908 में वे दक्षिण अफ्रीका पहुँचे तो उन्होंने देखा गिरमिटिया मजदूर के रूप में गये हिन्दू अपने धर्म और संस्कृति को भूल चुके हैं और मुस्लिमों के ताजिया निकालने के त्यौहार को प्रमुखता से मनाते हैं। स्वामी शंकरानन्द हिन्दुओं में जागृति पैदा की और शीघ्र ही दक्षिण अफ्रीका में दीपावली, रामनवमी और जन्माष्टमी मनाई जाने लगी। कालान्तर में स्वामी शंकरानन्द ने हिन्दुओं को संगठित करने के लिये दक्षिण अफ्रीका में हिन्दू महासभा की स्थापना की।

स्वामी रामेश्वरानंद
करनाल से जनसंघ के सांसद रहे गुरुकुल घरौंडा के आचार्य स्वामी रामेश्वरानंद महर्षि दयानन्द के परम भक्त थे। आप संसद में प्रश्न पूछने से पहले वेद मन्त्र का उच्चारण करते थे। आपने सांसद रहते हुए भी कभी संसद की कैंटीन का खाना नहीं खाया। जेब में दो रोटी लेकर संसद जाते थे। अपना सारा वेतन रक्षा कोष में देते थे। सरकारी कोठी की बजाए दिल्ली के सीताराम बाजार के आर्य समाज मंदिर के एक छोटे से कमरे में रहते थे। वहां से संसद तक पैदल जाते थे। आपने हैदराबाद आन्दोलन एवं गौरक्षा आन्दोलन में भाग लिया था। जब पंजाब से हिंदी को समाप्त करने के लिए षड्यन्त्र आरंभ हुआ तो आपने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के नेतृत्व में हिन्दी रक्षा के लिए आंदोलन किया।

भक्त फूल सिंह
हरियाणा में नारीशिक्षा के प्रचार-प्रसार का श्रेय भक्त फूल सिंह को जाता है। आपने पटवारी की सरकारी नौकरी छोड़कर वानप्रस्थ ग्रहण कर लिया और गांव-गांव घूमकर जनेऊ और ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ की प्रतियां बाँटकर आर्य समाज का प्रचार-प्रसार करने लगे। आपने भैंसवाल कलां में स्वामी श्रद्धानन्द से गुरुकुल की नींव रखवायी। मलिक खाप के मुखिया दादा घासी राम को गुरुकुल का अध्यक्ष बनाया गया। आपने कन्याओं की शिक्षा के लिए अनेक कार्य किये जिसमें कन्या गुरुकुल खानपुर की स्थापना प्रमुख है। 1937-38 में लाहौर में कसाईखाना बंद करने में आपका प्रमुख योगदान था। आपने गौवध रोकने के लिए अनेक हत्थे बंद करवाये। होडल और पलवल के मूळे जाटों की शुद्धि के उपरान्त उनसे रोटी-बेटी के सम्बन्ध प्रारम्भ करवाने के लिए जाटों की पंचायत बुलाई। हिसार के मोठ में मुस्लिमों द्वारा दलित भाईयों को कुआँ बनाने से रोकने पर आपने आमरण अनशन शुरू किया और कुआँ बनवाकर ही उठे। लोहारू में आर्यसमाज के जलूस पर मुसलमानों ने आक्रमण कर दिया जिसमें भक्त फूल सिंह को गहरी चोटें आईं और वे मूर्च्छित हो गये। आपके कार्यों से चिढ़े कुछ धर्मांध मुसलमानों ने कन्या गुरुकुल में आपकी गोलियां मारकर हत्या कर दी।

पं गणपति शर्मा
आर्य प्रचारक कालूराम जोशी के प्रभाव से पं गणपति शर्मा ने महर्षि दयानन्द का अनुयायी बनकर वैदिक धर्म व संस्कृति के प्रचार का कार्य आरम्भ किया। पं. गणपति की एक विशेषता यह थी कि वह बिना लाउडस्पीकर के 15-15 हजार की संख्या में 4-4 घटों तक धारा प्रवाह व्याख्यान करते थे। उनकी विद्वता एवं व्याख्यान में रोचकता के कारण श्रोता थकते नहीं थे। 39 वर्ष की अल्प जीवन काल में आपने अनेक शास्त्रार्थ किये। एक बार जम्मू कश्मीर में पादरी जानसन ने कश्मीरी पण्डितों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी परन्तु जब कोई तैयार नहीं हुआ तो महाराजा प्रताप सिंह बहुत चिन्तित व दुःखी हुए। महाराज को पता लगा कि एक आर्यसमाजी विद्वान श्रीनगर में उपस्थित है। राजपण्डितों के विरोध के बावजूद पं. गणपति शर्मा को बुलाया गया। उन्हें देख पादरी घबरा गया और बहाने बनाने लगा। परन्तु महाराजा की दृढ़ता के कारण उसे शास्त्रार्थ करना पड़ा। पं. गणपति शर्मा जी के तर्कों व युक्तियों तथा वेद आदि शास्त्रों के कभी न देखे, सुने व पढ़े प्रमाणों व उनके अर्थों को सुनकर राजपण्डित विस्मित हुए। अगले दिन 13 सितम्बर 1906 को आगे शास्त्रार्थ करना था परन्तु पादरी जानसन पहले ही श्रीनगर से भाग गया।

पं नरेंद्र (स्वामी सोमानन्द)
नरेंद्र प्रसाद सक्सेना के पिता अत्याचारी निजाम हैदराबाद के मनसबदार थे। किशोरवय में ही आपने उपासनी बाबा (साकोरी), साईं बाबा (शिरडी), नारायण स्वामी (कीट) आदि अनेक बाबाओं के दर्शन किये परन्तु कहीं भी संतुष्टि नहीं मिली। कालान्तर में आपको पं रामचन्द्र देहलवी व पं बुद्धदेव विद्यालंकार का सानिध्य मिला। दयानन्द उपदेशक विद्यालय, लाहौर में प्रवेश लेने पर स्वामी स्वतंत्रानन्द जी ने आपके जीवन को दिशा प्रदान की। अध्ययन पूरा होने के बाद आपने निजाम हैदराबाद के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाना प्रारम्भ किया। परिणामस्वरूप आपका बहुत सारा जीवन जेल में बीता। आर्य समाज द्वारा किये गये हैदराबाद आन्दोलन में आपने सक्रियता से भाग लिया। जब आर्य समाज ने निज़ाम के सामने 14 शर्तें रखीं तब उसने 13 शर्तें तो मान ली परंतु पं नरेन्द्र जेल से रिहा करने की 14वीं शर्त अस्वीकार कर दी। अपने अंतिम दिनों में उस्मान अली खान (निज़ाम) ने पं नरेंद्र को अपनी किंगकोठी पर बुलाकर अपने कुकर्मों के लिये उनसे माफ़ी मांगी थी। आपने अनेक आन्दोलनों में भाग लिया और अनेक संस्थाओं का कार्यभार सम्भाला। कालान्तर में आप आर्य समाज की शिरोमणि संस्था सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के उपप्रधान बने। आप कुशल वक्ता एवं लेखक थे। आप पहली राज्य विधानसभा के विधायक चुने गये। स्वामी सत्यप्रकाश से आपने संन्यास दीक्षा प्राप्त की तथा स्वामी सोमानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुए।

पं युधिष्ठिर मीमांसक
युधिष्ठिर की माता उन्हें सच्चा वेदपाठी ब्राहमण बनाना चाहती थीं। मरते समय निधन के पूर्व ही माता ने अपने पति आर्य प्रचारक पं गौरीलाल आचार्य से यह वचन ले लिया था कि वे इस बालक को गुरुकुल में अवश्य प्रविष्ट करायेंगे। सुयोग्य गुरुओं के सान्निध्य में अध्ययन कर युधिष्ठिर ने आर्ष ग्रन्थों पर अधिकार प्राप्त किया। 1950 में अपने काशी में पाणिनी महाविद्यालय की पुनः स्थापना की। आपने अनेक बहुमूल्य ग्रंथों की रचना की। भारत के राष्ट्रपति ने आपको 1976 में संस्कृत के उच्च विद्वान् के रूप में सम्मानित किया तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी ने 1989 में आपको महामहोपाध्याय उपाधि प्रदान की।

पं मनसाराम ‘वैदिक तोप’
1908 में टोहाना में एक शास्त्रार्थ में आर्यों के तर्कों को सुनकर मनसाराम महर्षि दयानन्द के परम भक्त बन गये। आपने संस्कृत सीखकर वेदादि शास्त्रों का अध्ययन किया और सनातन वैदिक धर्म के प्रचार में जुट गये। आपने अनेक शास्त्रार्थ किये और पाखण्ड के लिए प्रामाणिक ग्रन्थ लिखे। विरोधियों में उनकी दहशत इतनी थी कि शास्त्रार्थ में उनके आने की सूचना मिलते ही भाग खड़े होते थे। स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने के लिए जब उनको गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया तो वे मुंह पर काला कपड़ा डाल कर आये। मजिस्ट्रेट के पूछने पर उन्होंने कहा कि चांदी के चंद टुकड़े के लिए बिकने वाले का वह मुंह भी नहीं देखना चाहते। इस पर पं मनसाराम पर मानहानि का मुकदमा अलग से चलाया गया।

आचार्य भद्रसेन
आचार्य भद्रसेन एक सच्चे ब्राह्मण, पण्डित व विद्वान थे। आपने स्वामी सर्वदानन्द की सहायता से व पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु के आचार्यत्व में संस्कृत व वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया। आपने अपना जीवन सनातन वैदिक धर्म के प्रचार में लगा दिया। आचार्य भद्रसेन ने अनेक जनोपयोगी पुस्तकों की रचना की। आपने महर्षि दयानन्द के निर्देशानुसार जाति बंधन छोड़कर एक आर्य परिवार में विवाह किया। 1957 में आपने पंजाब में आर्यसमाज ने हिन्दी की रक्षा के लिए प्रचण्ड सत्याग्रह किया था। आपके पुत्र कैप्टेन देवरत्न आर्य आर्य समाज की शिरोमणि सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान रहे।

गुरुदत्त (साहित्यकार)
आर्य परिवार में जन्मे वैद्य गुरुदत्त महर्षि दयानन्द के अनन्य भक्त थे और आर्य समाज के पालने में पले-बढ़े लेखक-साहित्यकार थे। वे पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। विज्ञान के विद्यार्थी और पेशे से वैद्य होने के बावजूद वे बीसवीं शती के एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक थे जिन्होने लगभग दो सौ उपन्यास, संस्मरण, जीवनचरित, आदि का सृजन किया और भारतीय इतिहास, धर्म, दर्शन, संस्कृति, विज्ञान, राजनीति और समाजशास्त्र के क्षेत्र में भी अनेक उल्लेखनीय शोध-कृतियाँ दीं। जब ये लाहरुर के नेशनल कॉलेज में हेडमास्टर थे तो सरदार भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु इनके सबसे प्रिय शिष्य थे, जो बाद में स्वतंत्रता संग्राम में फाँसी का फंदा चूमकर अमर हो गए। आपने अपने लेखन के लिए यूरोपीय ग्रंथों को आधार न बनाकर विशुद्ध भारतीय स्रोतों— वैदिक और लौकिक संस्कृत-साहित्य को उपजीव्य बनाया और भारतीय इतिहासलेखन को एक नयी दिशा दी। आप भली-भाँति अंग्रेजी जानते थे, किन्तु अंग्रेजी का प्रयोग न करने का अथवा स्वल्प प्रयोग करने का संकल्प किया और हिंदी की अमूल्य सेवा की। काँग्रेस, नेहरू और गाँधीजी के कटु आलोचक होने के कारण शासन-सत्ता ने वैद्य गुरुदत्त की निरंतर घोर उपेक्षा की।

नानजीभाई कालिदास मेहता
प्रख्यात उद्योगपति नानजीभाई कालिदास मेहता छोटी आयु में ही अफ्रीका चले गये थे और अपना विशाल व्यापारिक साम्राज्य खड़ा किया। भारत के वडोदरा में कन्या गुरुकुल के आचार्य आनंदप्रिय जी अपनी वेदपाठी पुत्रियों के साथ धर्म प्रचार एवं गुरुकुल हेतु दान एकत्र करने अफ्रीका जाया करते थे। उनके कार्य को देख कर नानजीभाई आर्य समाज की ओर आकर्षित हुये और धीरे-धीरे महर्षि दयानन्द के परम भक्त बन गये। उन्होंने भारत, केन्या, यूगांडा, तंजानिया आदि देशों में अनेक आर्य समाज मन्दिरों, विद्यालयों, गुरुकुलों आदि संस्थाओं की स्थापना हेतु अथाह धनराशि अर्पित की। वे चाहते थे महर्षि दयानन्द की जन्मस्थली टंकारा, गुजरात में उनका भव्य स्मारक बने। इसके लिए उन्होंने डेमी नदी के तट पर बना टंकारा का ऐतिहासिक राजमहल खरीद कर टंकारा ट्रस्ट को समर्पित किया। इसी राजमहल में महर्षि दयानन्द के पिता कार्य किया करते थे।

डॉ० शिवसागर रामगुलाम
डॉ० शिवसागर रामगुलाम के नेतृत्व में मॉरिशस की स्वतंत्रता का सफल आन्दोलन हुआ। 1968 में मॉरिशस के स्वतंत्र होने पर डॉ० शिवसागर रामगुलाम उसके प्रथम प्रधानमंत्री बने। आप मॉरिशस में आर्य समाज के आदि-स्तम्भ मणिलाल डॉक्टर के कार्यों से प्रभावित थे। आपने मॉरिशस की शीर्ष आर्य संस्था आर्य सभा मॉरिशस की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जस्टिस मेहरचंद महाजन
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के तीसरे मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मेहरचंद महाजन महर्षि दयानन्द के परम भक्त थे। महाराजा हरिसिंह ने आपको जम्मू कश्मीर रियासत का प्रधानमंत्री नियुक्त किया और भारत में विलय के पश्चात् आप जम्मू और कश्मीर राज्य के प्रथम प्रधानमंत्री बने। आपने सामाजिक कुरीतियों से लड़ने के लिए अनेक कार्य किये। आपने लाहौर को भारत में शामिल करने का भरपूर प्रयास किया था परन्तु नेहरू ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। आप डी.ए.वी. कालेज प्रबंधकर्त्री कमेटी के प्रधान भी बने। आप के जन्म लेते ही ज्योतिषी ने आपकी जन्मपत्री बनाकर आपका मुख देखते ही आपके पिता की मृत्यु होने का विधान बताया। नवजात शिशु को एक गडरिये को दे दिया गया। जिससे आप आरम्भिक जीवन में केवल बकरी चराना ही सीख सके। उन्हीं दिनों लाहौर से एक आर्यसमाजी प्रचारक कांगड़ा पधारे। उन्होंने इस अन्धविश्वास का खण्डन किया। उनके आग्रह पर उनके पिता ने घर लाकर प्रथम बार अपने पुत्र का मुख देखा और उसकी पढ़ाई लिखाई प्रारम्भ कराई। इस घटना के बाद उनका परिवार स्वयं को महर्षि दयानन्द का ऋणी मानने लगा।

चौधरी छोटूराम
महान स्वतंत्रता सेनानी, किसानों के मसीहा एवं राजनेता चौधरी छोटूराम किशोरावस्था में ही महर्षि दयानन्द के अनुयायी बन गये थे। कॉलेज के प्रवेश फॉर्म में अपने आपको वैदिक धर्मी लिखा। स्वामी श्रद्धानन्द और मटिंडू गुरुकुल के संचालक चौधरी पिरु सिंह जैसे बड़े आर्यसमाजी नेताओं से आपकी निकटता थी। कांग्रेस से अलग होने के बाद आपने यूनियनिस्ट पार्टी की स्थापना की। चौधरी छोटूराम अपनी जनसभाओं के आरम्भ में हवन कराते थे एवं महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थ प्रकाश में लिखी बातें लोगों को अपने भाषणों में बताते थे। उनकी लोकप्रियता का पता इस बात से लग जाता है कि 1937 में हुए चुनावों में युनियनिस्ट पार्टी को 99 जबकि कांग्रेस को केवल 18 सीटें मिली थीं। यूनियनिस्ट पार्टी के मुस्लिम नेताओं द्वारा भारत विभाजन का समर्थन करने पर चौधरी छोटूराम ने इससे अलग होकर अलग पार्टी बना ली। चौधरी छोटूराम ने शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए अनेक शिक्षण संस्थानों की स्थापना की। दलितोद्धार एवं शुद्धि के कार्य में आपका अद्वितीय योगदान रहा। किसानों के उद्धार के लिए आपने अनेक आन्दोलन किये और अनेक कानून बनवाये।

चौधरी चरण सिंह
भारत के पाँचवें प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह महर्षि दयानन्द के अनन्य भक्त थे। उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और आर्य कुमार सभा से जुड़े रहे। आगे चलकर आर्य समाज गाजियाबाद के प्रधान पद का दायित्व भी सम्भाला। चौधरी चरण सिंह ने जीवन भर महर्षि दयानन्द की शिक्षाओं का पालन किया। आप गरीबों एवं किसानों के मसीहा के रूप में उभरे और राजनीतिक पटल पर विशेष स्थान बनाया। आपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, भारत के गृहमंत्री व वित्तमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों को शोभायमान किया। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने महर्षि दयानन्द के सिद्धांतों का पालन किया और राजनीतिक क्षेत्र में फैले किसी भी व्यसन या अवैदिक परम्परा को अपने पास फटकने भी नहीं दिया।

चौधरी मातूराम
चौधरी मातूराम महर्षि दयानन्द के जीवन काल में ही उनके अनुयायी बन गये थे। इस प्रकार आप पहली पीढ़ी के आर्य समाजी थे। आपके यज्ञोपवीत धारण करने पर कुछ धर्मांध लोगों ने पंचायत बुलाकर इसका विरोध किया। परन्तु चौधरी मातूराम ने कहा कि अब तो मेरी गर्दन काट कर ही यह जनेऊ उतरेगा। इस घटना से हजारों की संख्या में लोग आर्य समाजी बन गये और यज्ञोपवीत धारण किया। आपके भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह, चौधरी छोटूराम, लाला लाजपतराय एवं स्वामी श्रद्धानन्द जैसे आर्य समाजी क्रांतिकारियों से घनिष्ठ सम्बन्ध थे। चौधरी मातूराम के आर्य समाजी विचारधारा और स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी से अंग्रेज सरकार ने उनको जैलदारी का पद छीन लिया। चौधरी मातूराम ने शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। आपने सामाजिक कुरीतियाँ, अन्धविश्वास और छुआछूत को मिटाने के लिए आजीवन संघर्ष किया। कालान्तर में आपके पौत्र भूपिंदर सिंह हुड्डा हरियाणा राज्य के मुख्यमंत्री बने।

पं प्रकाशवीर शास्त्री
संयुक्त राष्ट्र संघ में सबसे पहले हिंदी में भाषण देने वाले महान राजनेता पं प्रकाशवीर शास्त्री महर्षि दयानन्द के अनन्य अनुयायी थे और आर्य समाज के सुदृढ़ स्तम्भ थे। 1940 में प्रकाशवीर शास्त्री की विद्वता से प्रभावित होकर पं मदनमोहन मालवीय ने उनसे हिंदू महासभा से जुड़ने का किया, मगर वह आर्य समाज व वेदों की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर चुके थे। यद्यपि महामना के आग्रह पर वे हिंदू महासभा और आर्य समाज के बीच पुल का काम करते रहे। जनता में आपकी लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि आपने लोकसभा का चुनाव तीन बार निर्दलीय लड़ा और तीनों बार जीते। कश्मीर से धारा 370 हटाने के लिए भारतीय संसद में पहला विधेयक लाने का श्रेय भी आपको ही प्राप्त है। आपने 16 वर्ष की अल्पायु में ही हैदराबाद आन्दोलन में भाग किया और जेल गये। जब पंजाब से हिंदी को समाप्त करने के लिए षड्यन्त्र आरंभ हुआ तो आपने हिन्दी रक्षा के लिए आंदोलन किया।

ओम प्रकाश त्यागी
प्रख्यात राजनेता एवं अदम्य साहसी ओम प्रकाश त्यागी महर्षि दयानन्द के अनुयायी थे। आपने आर्य समाज के युवा संगठन आर्य वीर दल के संचालक के रूप में कार्य किया। जब आप नौआखली दंगों में हिन्दुओं की रक्षा कर रहे थे तो कांग्रेस नेत्री सुचेता कृपलानी आपका विरोध करने लगीं। कुछ समय बाद मुस्लिम गुण्डे सुचेता कृपलानी को ही उठा कर ले जाने लगे तो ओम प्रकाश त्यागी ने दलबल के साथ पहुँच कर उनकी जान बचायी। उन्होंने मुस्लिम गुंडों से पाकिस्तानी झन्डा भी छीन लिया। स्वतंत्रता के पश्चात् ओम प्रकाश त्यागी अनेक बार संसद सदस्य बने। लोभ, लालच और धोखे से धर्मांतरण के विरुद्ध कानून बनाने के लिए आप संसद में विधेयक लाये। कालान्तर में आप आर्य समाज की शिरोमणि संस्था ‘सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा’ के मंत्री बने।

सत्यानन्द स्टोक्स
1900 ई० में ईसाई मिशनरी समुअल इवान स्टोक्स भारत में ईसाईयत का प्रचार करने अमेरिका से आये थे। भारत में प्लेग की महामारी फैली हुयी थी। ऐसे कठिन समय में समुअल ने आर्य समाजी प्रचारक पं रुलियाराम को अपने मुँह से रोगियों की गिल्टियाँ काटते देखा तो आप उनकी सेवा भावना से अत्यधिक प्रभावित हुए। फिर लाला लाजपत राय से मिलकर भारत की स्वतंत्रता के लिए उनके समर्पण से प्रभावित हुए। अंततः सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ पढ़ कर आपके ज्ञानचक्षु खुल गये। आपने सनातन वैदिक धर्म अपना कर अपना नाम सत्यानन्द स्टोक्स रख लिया और सनातन वैदिक धर्म के प्रचारक बन गये। आप भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले सम्भवतः एकलौते अमेरिकी थे। इसके अतिरिक्त वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित रॉयल नामक प्रजाति का लाल मीठा सेब भारत लाने का श्रेय भी आपको ही प्राप्त है।

लाला दीवान चंद
लाला दीवान चंद का जन्म पं लेखराम के गाँव सैदपुर (अब पाकिस्तान में) हुआ था। 6 वर्ष की आयु में अनाथ हुए दीवान चंद का बचपन अभावों में बीता और आप कक्षा 3 तक ही पढ़ पाये। निर्धनता की भट्टी में तपते हुये विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए लाला दीवान चंद अंततः दिल्ली के सबसे प्रसिद्ध सम्भ्रांत व धनिक बने। परन्तु आपका यश आपके धन से नहीं वरन आपकी समाजसेवा एवं दानवीरता से फैला। आपके गुणों के करण आपको अनेक बड़े संस्थानों, बैंकों, बीमा कम्पनियों आदि में निदेशक बनाया गया। अंग्रेज सरकार ने आपको नई दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी का कमिश्नर मनोनीत किया और ऑनरेरी मजिस्ट्रेट की पदवी दी थी। आप महर्षि दयानन्द के पक्के भक्त थे और स्वामी श्रद्धानन्द के परम सहयोगी थे। स्वामी श्रद्धानन्द के साथ मिलकर आपने दिल्ली में भारत के सबसे बड़े आर्य अनाथालय पटौदी हॉउस का निर्माण करवाया। आपने लालकिले के सामने भव्य आर्य समाज मन्दिर का निर्माण करवाया जिसे आर्य समाज दीवान हाल के नाम से विख्यात है। अपने अल्प जीवन काल में आपने असंख्य आर्य संस्थाओं को सहयोग प्रदान किया। निःसंतान लाला दीवान चंद ने महर्षि दयानन्द के सपनों को पूरा करने के लिए अपनी सारी संपत्ति एक ट्रस्ट बना कर आर्य समाज को समर्पित कर दी।

लाला साईंदास
पंजाब में आर्यसमाज के प्रारम्भिक कर्णधारों में लाला सांईदास का नाम सर्वप्रमुख है। लाला साईंदास ने महर्षि दयानन्द की विचारधारा से प्रभावित होकर आर्यसमाज लाहौर की स्थापना के समय ही उसकी सदस्यता स्वीकार कर ली थी। वे आर्यसमाज लाहौर के प्रथम मंत्री बने। पंजाब की आर्य प्रतिनिधि सभा की स्थापना के साथ ही वे इस संस्था के प्रधान निर्वाचित हुए और आजीवन इस पर रहे। हंसराज और लाजपतराय सरीखों को घेर कर ब्रह्मसमाज से आर्यसमाज में लाने तथा गुरुदत्त और मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) सरीखों को नास्तिकता के गहरे अन्धकारमय गढ़ में से उभार कर आस्तिकता की चोटी पर पहुंचाने वाले लाला सांईदास ही थे। 1881 में विरोधियों द्वारा महर्षि दयानन्द के सिद्धांतों के विरुद्ध व्यवस्थायें देने पर लाला सांईदास ने ‘रसाला एक आर्य’ पुस्तक उर्दू में लिखकर उनका तीव्र प्रतिवाद किया।

कुंवर चाँदकिरण शारदा
महर्षि दयानन्द के परम भक्त जज हरबिलास शारदा के भतीजे चाँदकिरण शारदा को आर्य समाज विरासत में मिला था। आप उच्च न्यायालय के नामी वकील थे। आपने अजमेर-मेरवाड़ा में मेहरातों को ईसाई बनने से रोका और विधर्मी बन चुके लोगों की घर वापसी के लिए शुद्धि अभियान चलाया। हैदराबाद आन्दोलन में प्रथम सर्वाधिकारी महात्मा नारायण स्वामी के गिरफ्तार होने के बाद आपको द्वितीय सर्वाधिकारी बनाया गया। विधवाओं के लिए अजमेर में आपने ‘राजस्थान वनिता आश्रम’ की स्थापना की। 1917-18 में फैली प्लेग महामारी के काल में आपने सेवा समितियाँ बना कर पीड़ितों की सेवा की। स्वतंत्रता आन्दोलन में आपकी प्रमुख भूमिका रही। विभाजन के बाद अजमेर आ रहे सिक्ख शरणार्थियों को अजमेर से निष्कासित करने के अजमेर सरकार के आदेश के विरोध में आपने मोर्चा खोल दिया और सरकार को झुकने पर विवश किया। महर्षि दयानन्द की जन्मस्थली पर स्मारक के निर्माण के लिए स्थापित टंकारा ट्रस्ट के आप प्रथम मंत्री बने।

सुंदरु वेंकैया
दक्षिण भारत के महान दलित चिंतक एवं कार्यकर्त्ता सुंदरु वेंकैया गोदावरी क्षेत्र से थे। उन्होंने महर्षि दयानन्द से प्रभावित होकर सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई और दलितों के उद्धार के लिए अनेक कार्य किये। उन्होंने दलित बस्तियों में साफ़-सफाई पर जोर दिया और दलितों को शाकाहार अपनाने के लिए प्रेरित किया। दलितों को अपने बच्चों को पढ़ाने के भी प्रेरित किया। विधर्मियों द्वारा दलितों के धर्मांतरण का विरोध किया और धर्मान्तरित हो चुके दलितों की घर वापसी के लिए शुद्धि अभियान चलाया।

भाग्य रेड्डी वर्मा
महर्षि दयानन्द के अनुयायी भाग्य रेड्डी को तेलंगाना क्षेत्र में दलित आन्दोलन का जनक माना जाता है। उन्होंने दलितों के उद्धार के लिए अनेक कार्य किये। उन्होंने देवदासी प्रथा का विरोध किया। विधर्मियों द्वारा दलितों के धर्मांतरण का विरोध किया और धर्मान्तरित हो चुके दलितों की घर वापसी के लिए शुद्धि अभियान चलाया। वे एक प्रभावशाली वक्ता थे और उन्होंने 25 वर्षों में 3300 से अधिक भाषण दिए। महामारियों के समय रोगियों की सेवा के लिए उन्होंने ‘स्वस्ति दल’ की स्थापना की। भाग्य रेड्डी को उनके कार्यों के लिए आर्य समाज द्वारा ‘वर्मा’ की उपाधि प्रदान की गई।

संतराम बी.ए.
संतराम बी.ए भारतीय इतिहास एवं समाज व्यवस्था के गंभीर अध्येता थे। वे महर्षि दयानन्द के सिद्धांतों से प्रभावित हो गए कि वर्णव्यवस्था जन्म से नहीं गुण-कर्म और स्वभाव से होती है। वे आर्य समाज के सदस्य बने और उन्होंने प्रसिद्ध आर्य नेता भाई परमानन्द की अध्यक्षता में जात पात तोड़क मण्डल की स्थापना की और स्वयं उसके मंत्री पद का कार्यभार सम्भाला। एक आर्य समाजी के रूप में उन्होंने हिन्दू समाज से जातिवाद के जहर को समाप्त करने के लिए कार्य किया। महर्षि दयानन्द के सम्मान में संतराम बी.ए. ने उनकी जीवनी लिखी।

गोविन्द वल्लभ पन्त
महर्षि दयानन्द के सिद्धांतों से प्रभावित होकर गोविन्द वल्लभ पन्त आर्य समाज नैनीताल के सदस्य बने और स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े। वे संयुक्त प्रान्त और फिर उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। बाद में वे भारत के गृहमंत्री भी बने। भारतीय संविधान में हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने और जमींदारी प्रथा को खत्म कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ उनके ही गृहमन्त्रित्व काल में आरम्भ किया गया था। बाद में यही सम्मान उन्हें उत्कृष्ट कार्य करने के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद द्वारा प्रदान किया गया।

स्वामी आनंदबोध
कश्मीर से दिल्ली आकर आपने आर्य समाज की सदस्यता ग्रहण की। आप शास्त्रार्थ महारथी पं रामचन्द्र देहलवी की कार्यशैली से प्रभावित थे। आर्य समाज के प्रति समर्पण भाव तथा मेहनत व लगन के परिणामस्वरूप आप आर्य समाज देहली (दीवान हाल) प्रधान चुने गये। कालान्तर में आप आर्य समाज की शिरोमणि संस्था सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान बने। आप ही के प्रयास से हैदराबाद सत्याग्रह को राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम स्वीकार किया गया। आपके नेतृत्व में अनेक आन्दोलन व अनेक सम्मेलन किए गये। आप संसद सदस्य भी रहे। कालान्तर में आपने स्वामी सर्वानन्द जी से संन्यास की दीक्षा ली तथा स्वामी आनन्दबोध सरस्वती के नाम से विख्यात हुए।

स्वामी समर्पणानन्द
महर्षि दयानन्द के परम भक्त पं कृपाराम के नाती बुद्धदेव विद्यालंकार आर्य समाज के अग्रिम पंक्ति विद्वानों में से एक हैं। आपके पिता पं रामचन्द्र ने आपको 7 वर्ष की आयु में गुरुकुल कांगड़ी में प्रवेश कराकर स्वामी श्रद्धानन्द के चरणों में समर्पित कर दिया था। वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन करने के बाद सन् 1916 में उन्होंने गुरुकुल से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और “विद्यालंकार’ की उपाधि से अलंकृत हुए। इसके बाद आपका नाम पं. बुद्धदेव विद्यालंकार पड़ा। तत्पश्चात् उन्होंने अपना जीवन वैदिक धर्म तथा आर्यसमाज के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। वे जहां उच्च कोटि के गद्य लेखक थे, वहीं प्रभावी कवि भी थे। संन्यास लेने के बाद आप ‘स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती’ के नाम से विख्यात हुए। आपने वैदिक धर्म पर आक्षेप करने वाले अनेक ईसाई व मुस्लिम विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया। जन्मना वर्ण-व्यवस्था तथा श्राद्ध आदि विषयों पर उन्होंने पौराणिक सनातनधर्मी विद्वानों से भी शास्त्रार्थ किए। आपने ने मेरठ में विश्व प्रसिद्ध ‘गुरुकुल प्रभात आश्रम’ की स्थापना कर संस्कृत के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त किया।

पं इन्द्र विद्यावाचस्पति
गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना कर स्वामी श्रद्धानन्द ने सर्वप्रथम अपने पुत्रों को ही उसमें प्रवेश दिलाया। उन्हीं में से एक पुत्र इन्द्र विद्यावाचस्पति के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आप कुशल पत्रकार, गंभीर विचारक एवं इतिहासवेत्ता थे। अपने जीवनकाल में आपने विजय, वीर अर्जुन तथा जनसत्ता का सम्पादन किया। ‘विजय’ दिल्ली से प्रकाशित होने वाला पहला हिन्दी समाचार पत्र था। शिक्षा के क्षेत्र में आपका सबसे महत्वपूर्ण योगदान गुरुकुल कांगड़ी का संचालन एवं मार्गदर्शन है। इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के रूप में कार्य करते हुए आपने गुरुकुल की उपाधियों को केन्द्र एवं राज्य सरकारों से मान्यता प्रदान कराने का स्तुत्य एवं सफल कार्य किया। गुरुकुल में हिन्दी माध्यम से तकनीकी विषयों की शिक्षण की व्यवस्था करके आपने हिन्दी की अमूल्य सेवा की। कालान्तर में आप आर्य समाज की शिरोमणि संस्था ‘सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा’ के मंत्री बने। आप राज्यसभा सांसद भी रहे।

पं नरदेव वेदालंकार
गुरुकुल कांगड़ी में अध्ययन कर नरदेव ने विद्यालंकार की उपाधि अर्जित की। तत्पश्चात आपने भारत में अध्यापन कार्य किया। 1947 में आपने दक्षिण अफ्रीका प्रस्थान किया और गुरुकुल के पुराने सहपाठियों से सम्पर्क हुआ। आर्य प्रतिनधि सभा के साथ मिल कर दक्षिण अफ्रीका को अपनी कर्म स्थली बनाया। आपने दक्षिण अफ्रीका में हिंदी शिक्षा संघ, वैदिक पुरोहित मण्डल, वेद निकेतन, हिन्दू धर्म प्रचार ट्रस्ट जैसी अनेक संस्थाओं की स्थापना की। आपने वेदों और आर्य समाज के प्रचार के लिए हिंदी और गुजराती में अनेक पुस्तकों की रचना की। विदेशों में प्रवासी भारतीयों को सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति से जोड़े रखने के लिए आर्य समाज द्वारा किये गये कार्यों के वर्णन के लिए ‘आर्य समाज एंड इंडियंस अब्रॉड’ नामक पुस्तक की रचना की। हिन्दुओं में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए आपने विशेष योगदान दिया। सनातन वैदिक धर्म को आपके अद्वितीय योगदान के लिए सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने आपको ‘आर्य रत्न’ सम्मान से विभूषित किया।

सत्यकेतु विद्यालङ्कार
सत्यकेतु विद्यालङ्कार भारतीय इतिहासकार एवं लेखक थे। आप गुरुकुल कांगड़ी के छात्र रहे जहाँ से आपने स्नातक किया। आप इतिहास के प्राध्यापक, उपकुलपति, कुलाधिपति भी रहे। आपने 50 से अधिक पुस्तकों की रचना की जिनमें सात खण्डों में लिखा ‘आर्यसमाज का इतिहास’ प्रमुख है। इतिहास में डी-लिट करने के उद्देश्य से आप जर्मनी के क्युनिक विश्वविद्यालय गये। आपके शोध का विषय था, ‘भारत में प्रचलित जातिवाद का मूल स्रोत’। आप उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य भी रहे।

पं राजाराम शास्त्री
ईसाई शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के धर्म परिवर्तन की चेष्टाओं को देख कर नवयुवक राजाराम का अंग्रेजी से मन उचट गया और वे संस्कृत पढ़ने को उद्यत हुये। इसी क्रम में आपने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा जो आपके लिए क्रान्तिकारी परिवर्तन का कारण बना तथा आप में संस्कृत के शास्त्रों के गहनता पूर्वक अध्ययन करने की रुचि आप में उदित हुई। अध्ययन पूर्ण के बाद आपकी विद्वता देखते हुए महात्मा हंसराज ने आपको डी.ए.वी. स्कूल, लाहौर में संस्कृत शिक्षक नियुक्त किया। शीघ्र ही आप डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर में संस्कृत प्राध्यापक के रूप में पदोन्नत हो गये। 5 वर्ष के पश्चात् आप वेदादि शास्त्रों के अध्ययन के लिए काशी गये। लौटने पर डी.ए.वी. प्रबंधकर्त्री समिति ने आपको ग्रन्थों के अनुवाद का कार्य सौपा। इसी क्रम में आपने अनेक ग्रंथों की रचना की।

पं शिवपूजन सिंह कुशवाह
पं. शिवपूजनसिंह कुशवाह महर्षि दयानन्द के परम भक्त एवं आर्यसमाज के उच्च कोटि के वैदिक विद्वानों में अग्रणीय विद्वान थे। आपने शास्त्रों का अध्ययन कर उच्च कोटि की विद्वता प्राप्त कर आर्यसमाज के वैदिक सिद्धान्तों वा विचारधारा का लेखनी के द्वारा समर्पण भाव से प्रचार किया। आचार्य कुशवाह जी ने लगभग 50 ग्रन्थों का प्रणयन किया। पं शिवपूजनसिंह ने अपने लेखकीय जीवन में आर्यसमाज एवं वैदिक धर्म के सिद्धान्तों पर सैकड़ों लेख लिखे तथा प्रतिपक्षियों के आक्षेपात्मक विचारों का सप्रमाण उत्तर दिया। आपने कानपुर में दयानन्द शोध संस्थान की स्थापना की जिसके अन्तर्गत रुद्र-ग्रन्थमाला के अन्तर्गत उनके कई ग्रन्थ छपे। आप ने दिल्ली के गुरुकुल गौतमनगर में रहते हुए अध्यापन कार्य भी किया।

पं महेश प्रसाद मौलवी आलिम फाजिल
पं महेश प्रसाद मौलवी आलिम फाजिल उर्दू, फारसी व अरबी भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान थे। पं मदनमोहन मालवीय उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय लाये और उन्हें उर्दू, फारसी व अरबी भाषा विभाग का प्रथम विभागाध्यक्ष का कार्यभार सौंपा। महेश प्रसाद ने इन भाषाओँ के साहित्य की गहन खोज की और अनेक खोजपरक ग्रन्थ लिखे। महेश प्रसाद मौलवी ने महर्षि दयानन्द और आर्य समाज से संबधित अनेक ग्रन्थ भी लिखे जिनमें ‘सत्यार्थ प्रकाश की व्यापकता’ प्रमुख है।

प्रो शेर सिंह
दृढ़ आर्य परिवार में जन्में शेर सिंह कादयान को आर्य समाज विरासत में मिला। दलितों के लिए पानी की व्यवस्था करने के लिए उनके पिता और चाचा ने बाघपुर ग्राम में अपने खेत पर कुआँ खुदवाया। इसके लिए गांववासियों ने आपके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। यहाँ तक कि शेर सिंह के विवाह का रिश्ता भी टूट गया परन्तु अपने दलित भाइयों के लिए आपका आर्य परिवार डटा रहा। यह देखकर प्रसिद्ध आर्य विद्वान पंडित बुद्धदेव वेदालंकार ने आपसे अपनी छोटी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखा और आपका विवाह गुरुकुल कांगड़ी में सम्पन्न हुआ। आपने स्वतंत्रता आन्दोलन, हैदराबाद आन्दोलन एवं शराबबंदी आन्दोलन में भाग लिया। आपने स्वतंत्र भारत में पहले दोनों विधानसभा चुनाव लड़कर जीते। आप पंजाब के उपमुख्यमंत्री बने परन्तु तत्कालीन मुख्यमंत्री की हिंदी विरोधी नीति के चलते त्यागपत्र देकर स्वामी ओमानन्द के नेतृत्व में हिंदी आन्दोलन में कूद पड़े।

पं बस्तीराम
हरिद्वार कुम्भ मेले में पाखण्ड खंडनी पताका स्थापित कर महर्षि दयानन्द द्वारा किये गये शास्त्रार्थ का प्रत्यक्षदर्शी बस्तीराम पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे उनके शिष्य बन गये। बस्तीराम घूम घूम कर वैदिक धर्म का प्रचार और पाखण्ड खण्डन करने लगे। जब महर्षि दयानन्द के रेवाड़ी में व्याख्यान हुए तो उससे पहले दादा बस्तीराम के एक दो भजन होते थे। आपने मध्य हरियाणा, उतर हरियाणा, यूपी व राजस्थान में आर्य समाज की धूम मचा दी। अनेक शास्त्रार्थ किये। आपने 117 वर्ष की आयु तक सनातन वैदिक धर्म का प्रचार किया।

महाशय कृष्ण
महर्षि दयानन्द के अनन्य भक्त महाशय कृष्ण महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानन्द) के दाहिने हाथ कहलाते थे। 1919 में जलियांवाला बाग़ नरसंहार से आंदोलित होकर आप ने ‘प्रकाश’ एवं ‘दैनिक प्रताप’ नामक उर्दू समाचार पत्र आरम्भ किये। आपने अपनी कलम को माध्यम बनाते हुए पूरे भारत में आजादी की अलख जगाई। निजाम के विरुद्ध हैदराबाद आन्दोलन में आप छठे अधिनायक चुने गये और आपके नेतृत्व में 760 सत्याग्रहियों के विशाल जत्थे ने औरंगाबाद पहुँच कर सत्याग्रह किया। आपको दो वर्ष की कड़ी कैद की सजा सुनायी गयी। आपने हिन्दू रियासतों में सत्याग्रह करने और मुस्लिम रियासतों में हिन्दुओं पर अत्याचारों पर मौन रहने के लिए कांग्रेस को फटकारा। आपने लाहौर में आर्य समाज के उत्सव में पधारे नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना के लिए 10000 रूपये की राशि भेंट की। आपके पुत्र महाशय वीरेन्द्र ने भी पत्रकारिता के माध्यम से स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान दिया। आपके दूसरे पुत्र महाशय नरेन्द्र ने ‘वीर अर्जुन’ नामक समाचार पत्र प्रारम्भ किया।

स्वामी अच्युतानन्द
स्वामी अच्युतानन्द स्वयं महर्षि दयानन्द से टक्कर लेने वालों में से थे परन्तु आगे चल कर वे उनके अनुयायी बन गये। उनको आर्य समाज की ओर आकृष्ट करने का श्रेय पं गुरुदत्त विद्यार्थी को जाता है। आप अद्वैतवाद की विचारधारा और मण्डलेश्वर का पद त्याग कर आर्य सन्यासी बन गये और वैदिक धर्म का प्रचार करने लगे। महर्षि दयानन्द जन्म शताब्दी के अवसर पर आयोजित एक सम्मेलन में स्वामी अच्युतानन्द उनके साथ अपने संस्मरण सुनाये। कालान्तर में आपने लुधियाना में भव्य शांति आश्रम की स्थापना की।

पं० माधवराव जोशी
पं० माधवराव जोशी नेपाल के राज ज्योतिषी थे और राजकुमारों को शिक्षा देते थे। वे नेपाल के हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों से व्यथित रहते थे और सच्चे धर्म की जिज्ञासा में वे भारत के अनेक स्थानों भटके। काशी में उन्हें महर्षि दयानन्द का व्याख्यान साक्षात् सुनने का सौभाग्य मिला जिससे उनकी जीवनधारा की पलट गई। उन्होंने महर्षि दयानन्द से जाति, वर्णव्यवस्था, ईश्वर निराकार है वा साकार, परमेश्वर की प्राप्ति के साधन, यम-नियम, योगसाधन तथा शास्त्र के विरोधादि पर पूछकर शंका समाधान किया और ऋषि भक्त बनकर नेपाल लौटे। सत्यार्थ प्रकाश पढ़ कर वैदिक सिद्धांतों के प्रति उनकी श्रद्धा और बढ़ गयी और वे नेपाल में आर्य समाज का प्रचार करने लगे। आर्य समाज के विरोधियों ने नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री को भड़काकर राजदरबार में अभियोग चलाया गया परन्तु तत्कालीन महाराज देव शमशेर जंगबहादुर राणा ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया। कालान्तर में चन्द्र शमशेर जंगबहादुर राणा नेपाल के शासन में आर्य समाज के विरोधियों ने एक बार शास्त्रार्थ के बहाने जोशी जी को दरबार में बुलाकर खूब मार-पीट की और एक तंग कोठड़ी में कैद कर दिया। जोशी जी को मार-पीट के पश्चात् क्षतविक्षत तथा लहुलुहान करके, सिपाहियों से पकड़वाकर उनको सारे नगर में बुरी प्रकार से घुमाया गया। आगे चल कर पं० माधवराव जोशी के पुत्र शुक्रराज शास्त्री को भी नेपाल सरकार ने फांसी दे दी थी।

महाशय रामचन्द्र ‘मेघ'
रामचन्द्र महाजन जम्मू कश्मीर सरकार में खजांची के पद पर कार्यरत थे। आर्य समाज के सत्संगों में जाने से आप महर्षि दयानन्द के अनुयायी बन गये। आपने विभिन्न स्थानों पर आर्य समाज के प्रचार का कार्य किया। अछूतोद्धार एवं शुद्धि के कार्य के लिए आपको अनेक विरोध झेलने पड़े परन्तु आप डटे रहे। आपके प्रयासों से साम्बा में आर्य समाज की स्थापना हुयी। अखनूर स्थानांतरित होने पर आपने वहां मेघ समुदाय के साथ छुआछूत का विकराल रूप देखा। रामचन्द्र ने मेघों का उत्थान के लिए अखनूर के पहाड़ों में घूम-घूम कर उनके दु:ख-दर्द का साथी बन उनकी सेवा, सहायता तथा उन्हें पढ़ाने व उनकी बीमारी आदि में उनकी हर संभव सहायता करने लगे। इससे वे लोग चिढ़ गये जो लोग दलितों की उन्नति होता न देख सकते थे। वे सरकार व मुसलमानों को आपके खिलाफ भड़काने लगे और रामचन्द्र पर हमले के प्रयास भी किये। नि:स्वार्थ सेवा के कारण मेघ समुदाय आप पर अपनी जान न्योछावर करता था। इधर रामचन्द्र भी अपने आप को मेघ कहने लगे, चाहे आप महाजन जाति से थे। इसी बीच एक अन्य ग्राम में मेघों के आमन्त्रण पर जाते समय उनके दलितोद्धार कार्य के विरोधियों ने उनको घेरकर लोहे की छड़ों से प्रहार किया। आप जब बुरी तरह से घायल व बेहोश हो गये तो यह आक्रमणकारी इन्हें मरा समझ कर लौट गए। 6 दिन तक बेहोश रहने के बाद महर्षि दयानन्द के इस महान भक्त का बलिदान हो गया।

मजिस्ट्रेट विद्यावती शारदा
भारत की प्रथम महिला मजिस्ट्रेट विद्यावती शारदा की शिक्षा दीक्षा शारदा निकेतन, ज्वालापुर में हुयी। आपके राष्ट्रवादी विचारों के कारण आप आर्य समाज की ओर आकर्षित हुयीं। क्रांतिकारी कार्यों के सिलसिले में ही आपका परिचय प्रसिद्ध आर्य समाजी एवं क्रान्तिकारी पं गयाप्रसाद शुक्ल के साथ हुआ कालान्तर में जिनसे आपका विवाह हुआ। प्रसिद्ध आर्य समाजी एवं क्रान्तिकारी भगतसिंह तीन माह तक लालसिंह के छद्मनाम से विद्यावती शारदा के घर टापरी में रहे थे। आपने 1936 में कन्या महाविद्यालय, बड़ोदा में अध्यापन कार्य किया और 1937 में उन्नाव में आपको मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया। प्रसिद्ध आर्य विद्वान पं वेदभिक्षु (भारतेन्द्र) आप ही के सुपुत्र हैं जिन्होंने दयानन्द संस्थान की स्थापना कर वेदों की महती सेवा की। एक बार 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के कार्य से लौटने पर विद्यावती शारदा अपने पुत्र से बोलीं – ‘या तो कुछ कर, नहीं तो मर’। इससे भारतेन्द्र को तैश आ गया और उसी रात एक सरकारी कार्यालय फूँक आये।










































